Naidunia Election Flashback: रवींद्र वैद्य, शहडोल। मेरी उम्र उस समय 28 साल की थी। सागर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में एमए की पढ़ाई कर चुनाव मैदान में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कूद पड़ा था। बस चुनाव लड़ने का जुनून था। चुनाव लड़ने के संसाधन नहीं थे। यह बात सन 1972 की है। जयसिंहनगर विधान सभा क्षेत्र से जब नामांकन कर दिया तो यह बात मेरे सहपाठियों को पता चली। मेरे दोस्तों ने साइकिल से क्षेत्र के गांव-गांव का दौरा किया। जहां रात होती वहीं रुक जाते। दोस्ती के प्रचार के दम पर मेरी जीत हो गई। यह कहना है कि पूर्व विधायक कमला सिंह का।
उन्होंने बताया कि उस समय चुनाव का जुनून ऐसा था कि कुनुक नदी को पार कर दूसरे गांवों में जब प्रचार के लिए जाते थे तो सभी अपनी साइकिल को कंधे पर रखकर नदी पार करते थे। उस समय ज्यादा कार्यकर्ताओं की फौज नहीं होती थी। जहां भूख लगी उसी गांव में डेरा डाला और फिर गांव के मुखिया भोजन का इंतजाम करते थे।
लोग निस्वार्थ भाव से भोजन कराते थे और इसमें वह अपनी शान समझते थे। इसके बाद जब मैंने दूसरा चुनाव सन 1980 में लड़ा तब प्रचार के लिए मैंने जबलपुर से एक पुरानी जीप खरीद ली। जो उस समय चार हजार रुपये में खरीदी थी। उससे प्रचार किया। यह वाहन मुझे बहुत परेशान करता था। अक्सर खराब हो जाता था लेकिन हम लोग हिम्मत नहीं हारते थे।
पहले चुनाव में मैंने सिर्फ 20 हजार रुपये खर्च किए थे और दूसरे चुनाव में जब मैं दोबारा जयसिंहनगर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीता तब मैंने अपने पास से 52 हजार रुपये खर्च किए थे। तभी चुनाव दर चुनाव खर्च बढ़ने लगा था। आज तो चुनाव बहुत मंहगा हो गया है पहले लोग अच्छे थे और नीतियों के आधार पर संस्कारयुक्त राजनीति करते थे। प्रत्याशी के चयन का भी उनका आधार यही होता था।