
नईदुनिया प्रतिनिधि, शहडोल। परिस्थितियां कितनी भी कठिन हों, सीखने का जज्बा हो तो रास्ता निकल ही आता है। शहडोल जिले के खम्हरिया पंचायत के पचड़ी गांव के 32 वर्षीय संजीव कुमार बैगा की कहानी इसी जज्बे की मिसाल है। बचपन में पिता का साया उठ गया। मां ने पालन-पोषण किया। आर्थिक तंगी के कारण 12वीं के बाद पढ़ाई छूट गई और संजीव मजदूरी करने लगे। लेकिन मन में कुछ अलग करने की ललक थी। ऐसा हुनर जो रोजगार के साथ सम्मान भी दे।
मौका मिला शहडोल के छतवई स्थित संत रविदास हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम के प्रशिक्षण केंद्र में। संजीव ने 100 दिन का वुडन क्राफ्ट प्रशिक्षण लिया और लकड़ी पर नक्काशी की कला में पारंगत हो गए।
आज संजीव लकड़ी से देवी-देवताओं और आकर्षक कलाकृतियों की प्रतिमाएं बनाते हैं। एक दिन में 8 से 10 मूर्तियां तैयार कर लेते हैं। इससे उन्हें हर महीने 10 से 15 हजार रुपये की आमदनी हो रही है। हुनर के साथ पढ़ाई का सिलसिला भी नहीं टूटा। 2018 में बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक किया, राजस्व निरीक्षक का विशेष डिप्लोमा किया और अब एमएसडब्ल्यू कर रहे हैं। संजीव कहते हैं कि अब वुडन आर्ट ही मेरा भविष्य है।
छतवई केंद्र में संचालित तरु शिल्प समिति संजीव जैसे कलाकारों के लिए बड़ा सहारा बनी है। जिला प्रशासन के सहयोग से समिति का ट्रेडमार्क और पंजीयन कराया गया। अब समिति के उत्पाद अमेजन जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिक रहे हैं।
हाल ही में 37 उत्पादों की डिमांड आई, जिन्हें पैक कर इंदौर स्टोर भेजा गया है। कुछ उत्पादों की बिक्री भी हो चुकी है। अब समिति हर महीने 50-60 उत्पाद तैयार करने के लक्ष्य पर काम कर रही है। समिति में कुल 34 सदस्य हैं, जिनमें 18 कलाकार वुडन क्राफ्ट से जुड़े हैं। बाकी दरी, कालीन और पेंटिंग का काम करते हैं।
केंद्र के प्रभारी प्रबंधक एस.एस. पांडे बताते हैं, "संजीव 3-4 साल पहले केंद्र से जुड़े थे। पचड़ी में दरी का प्रशिक्षण चल रहा था, लेकिन उनकी रुचि वुडन आर्ट में थी। उन्होंने मेहनत से कला सीखी। आज वे 12 से 14 हजार रुपये महीना कमा रहे हैं। उन्हें राज्य स्तरीय पुरस्कार के लिए भी प्रस्तावित करने की तैयारी है।" संजीव की कहानी बताती है कि सही प्रशिक्षण और मेहनत मिले तो मजदूरी करने वाला हाथ भी हुनरमंद कलाकार बनकर आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख सकता है।