
Kans Vadh in Shajapur: शाजापुर। शहर के सोमवारिया बाजार में कंस दशमी पर कंस वध कार्यक्रम का आयोजन हुआ। कंस वध के पहले श्री कृष्ण और कंस की सेना के बीच जमकर वाकयुद्ध हुआ। श्रीकृष्ण और कंस के सैनिक के रुप में सजे-धजे कालाकारों ने एक-दूसरे पर तीखे व्यंग बाण चलाए। रात ठीक 12 बजते ही भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया। इसके बाद गवली समाज के लोग कंस के पुतले को लाठी-डंडों से पीटते हुए जमीन पर घसीटते हुए नई सड़क की ओर ले गए। इस मौके पर आयोजन समिति द्वारा गवली समाज के वरिष्ठ जनों का स्वागत सम्मान भी किया गया।
कार्यक्रम को लेकर कई दिनों से तैयारियां की जा रही थी। शहर में करीब 270 वर्षों से कंस वधोत्सव की अनूठी परंपरा निभाई जा रही है। यह आयोजन उत्तर प्रदेश में श्रीकृष्ण जन्मस्थान मथुरा के अलावा मध्य प्रदेश में सिर्फ शाजापुर में किया जाता है।

बुधवार रात कंस दशमी पर कलाकार देव व दानव की वेषभूषा में तैयार हुए और देव व दानवों का जुलूस बालवीर हनुमान मंदिर से निकाला गया। चल समारोह में देवता बनने वाले कलाकारों ने लोगों का अभिवादन किया। देर रात तक देव व दानवों में चुटीले संवादों का वाक युद्ध हुआ। जिसका लोगों ने खूब आनंद लिया। वहीं दानवों का रूप धरे कलाकार राक्षसी अट्टहास से सभी लोगों को डराते हुए नजर आये।
पारंपरिक वेशभूषा में सजे धजे कलाकार वाक युद्ध देखने बड़ी संख्या में नागरिक कार्यक्रम स्थल पहुंचे। मथुरा में देखा तो शाजापुर में की शुरूआतआयोजन समिति के लोग बताते हैं कि यह आयोजन सिर्फ श्रीकृष्ण जन्मस्थान मथुरा में होता है। शाजापुर के लोगों ने वहीं पर यह आयोजन देखा।
इसके बाद करीब 270 साल पहले शाजापुर में इस आयोजन की शुरूआत हुई। दो तब से ही अनवरत चल रहा है। कोरोना काल में भी आयोजन की परंपरा जारी रही। आयोजन समिति के लोग बताते हैं कि शुरूआत में यह कार्यक्रम छोटे स्तर पर आयोजित होता था। किंतु समय के साथ यह आयोजन विशाल और भव्य रुप लेता जा रहा है।

रात 12 बजते ही पारंपरिक वेशभूषा में श्रीकृष्ण बने कलाकार द्वारा कंस के पुतले का वध करने उसे सिंहासन से नीचे गिराया गया। इसके बाद यहां पर पहले से ही हाथ में लाठी और डंडे लिए हुए तैयार लोग लाठियों से पीटते हुए कंस के पुतले को घसीटते हुए ले गए। बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सवकंस वध का महत्व और मान्यताएं बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव को दर्शाता है।
कंस वध कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष के दसवे दिन दसमी तिथी पर मनाया जाता है। श्री कृष्ण ने अपने माता -पिता और अपने दादा उग्रसेन को बंदी ग्रह से आजाद करने के लिए और मथुरा की प्रजा को कंस के अत्याचारों से मुक्त करने के लिए कंस का वध किया था। इस प्रकार अच्छाई की बुराई पर जीत हुई और इसी की याद में यह आयोजन किया जाता है।

कंस वधोत्सव समिति के संयोजक तुलसीराम भावसार ने बताया कि मथुरा के बाद नगर में इस आयोजन को भव्य तरीके से मनाया जाता है। इस आयोजन के लिए शहर ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों के लोग भी इसमें शामिल होते हैं।
कंस वध की परंपरा अन्याय व अत्याचार पर जीत के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है। इस भव्य आयोजन में देव और दानव मिलकर 15 से 20 कलाकार रहेंगे। शहर की गलियों से कंस वध से पहले पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे देव और दानवों की टोलियां निकलती है।