
श्री कृष्ण जन्मस्थान मथुरा के अलावा सिर्फ मालवा के शाजापुर जिले में ही होता है यह अनोखा आयोजन
Kansa Vadotsav: मोहित व्यास, शाजापुर। कार्तिक माह की दशमी पर होने वाले अनूठे आयोजन से शहर के एक चौराहे का नाम कंस चौराहा पड़ गया है। दरअसल 269 वर्षों से शहर में अनूठी परंपरा निभाई जा रही है। यहां दीपावली के बाद कार्तिक माह की दशमी पर कंस वधोत्सव का आयोजन होता है। यह कार्यक्रम श्रीकृष्ण जन्म स्थान मथूरा के अलावा शाजापुर में ही होता है। आयोजन में कंस और कृष्ण की सेना आपस में जमकर वाक् युद्ध करती हैं। इसके बाद श्री कृष्ण द्वारा कंस का वध किया जाता है। कल भी शहर में यह आयोजन होगा, जिसे लेकर तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
शुरूआत में यह आयोजन सोमवारिया क्षेत्र स्थित गोवर्धन नाथ मंदिर परिसर में सूक्ष्म रूप में होता था। जिसमें गिनती के ही लोग शामिल होते थे। किंतु दिनों-दिन नागरिक इस आयोजन से जुड़ते गए। प्राचिन मंदिर के स्थान पर अब गोर्वधन नाथ की आलीशान हवेली बन गई है।
मंदिर में छोटे पैमाने पर होने वाला कंस वधोत्सव बीते कई वर्ष से मुख्य चौराहे पर आयोजित हो रहा है। यह आयोजन ही अब चौराहे की पहचान बन गया और लोग इस चौराहे को अब कंस चौराहे के नाम से जानते हैं। नगर पालिका अध्यक्ष प्रेम जैन कहते हैं कि मेरी आयु 60 वर्ष है। मैंने जब से होश संभाला है, तव से कंस वधोत्सव आयोजन स्थल को कंस चौराहे के नाम से जाना और सुना है। नपा बीते कई साल से इस आयोजन का खर्च भी उठा रही है।
उत्साह के साथ अनुशासन
कंस वधोत्सव का यह आयोजन उत्साह के साथ अनुशासन का संदेश भी देता है। एक छोटे से चौराहे पर इस आयोजन में हजारों की भीड़ जुटती है। जिसमें हर उम्र के लोग शामिल रहते हैं। बावजूद यहां बीते कई वर्षों में किसी भी तरह की अव्यवस्था या विवाद आदि सामने नही आए। आयोजन में मौजूद रहने वाले वरिष्ठ पूरे समय सक्रिय रहते हैं और भीड़ प्रबंधन से लेकर वधोत्सव के आयोजन तक शांतिपूर्ण संपन्न होने के बाद ही चैन की सांस लेते हैं।
यह होता है कार्यक्रम
बीते साल वर्ष से आयोजन के संयोजक तुलसीराम भावसार बताते हैं कि कलाकार देव व दानव की वेषभूषा में तैयार होते हैं। दोनों ही दल का चल समारोह भी निकलता है, देर रात तक देव व दानवों में चुटीले संवादों का वाक्युद्ध होता है। ठीक रात 12 बजे श्रीकृष्ण बने कलाकार कंस के पुतले का वध करते हैं और उसे सिंहासन से नीचे गिराया जाता है। यहां पर पहले से तैयार खड़े गवली समाजजन पुतले को लाठी और डंडे से पीटते हुए घसीटकर ले जाते हैं और नईसड;क पर एक भवन की छत पर पुतले के अवशेष बुराई के अंत के संदेश के रुप टांग दिए जाते हैं।
इस तरह हुई शुरूआत
कंस वधोत्सव की अनूठी परंपरा की शुरूआत को लेकर लोकसंस्कृतिविद् डा. जगदीश भावसार बताते हैं गोर्वधन नाथ मंदिर के पुजारी मोतीलाल मेहता (गेबी जी) मथूरा जाया करते थे। उन्होंने वहां यह आयोजन देखा। उन्होंने ही यह आयोजन अपने साथियों के साथ शाजापुर में प्रारंभ किया। शुरूआत बहुत छोटे स्तर पर हुई। इसके बाद यह आयोजन आमजन में चर्चित और लोकप्रिय होता गया। स्थिति यह है कि इस आयोजन को लेकर शहरवासियों में कंस का पुतला मंच पर रखे जाने के बाद से ही उत्साह दिखने लगता है। कई लोग परिवार सहित यहां पहुंचकर कंस के पुतले के साथ सेल्फी आदि भी लेते रहते हैं।