
नईदुनिया प्रतिनिधि, श्योपुर। मध्य प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सुलग रहा विजयपुर विधानसभा उपचुनाव विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। हाईकोर्ट में चल रही चुनाव याचिका की सुनवाई लगभग पूरी हो चुकी है और अब सिर्फ अंतिम तर्क बाकी हैं। सूत्रों के मुताबिक 30 जनवरी के बाद हाईकोर्ट कभी भी इस हाईप्रोफाइल मामले में फैसला सुना सकता है। इस संभावित फैसले से जहां विजयपुर की सियासत की तस्वीर बदल सकती है, वहीं मौजूदा कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा की मुश्किलें लगातार बढ़ती नजर आ रही हैं।
पूर्व वन एवं पर्यावरण मंत्री रामनिवास रावत द्वारा दाखिल चुनाव याचिका पर हाईकोर्ट में लगातार सुनवाई चल रही है। इसी क्रम में कोर्ट के निर्देश पर गुना कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल और अलीराजपुर एसडीएम मनोज कुमार गढ़वाल के बयान साक्ष्य सूची में दर्ज किए जा चुके हैं।
प्रशासनिक अधिकारियों के बयान दर्ज होने के बाद मामला अब अंतिम बहस के चरण में पहुंच चुका है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में इसे विजयपुर उपचुनाव का ‘टर्निंग प्वाइंट’ माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि रावत को अपनी याचिका के फैसले को लेकर पूरा भरोसा है और वे उपचुनाव को लेकर आश्वस्त दिखाई दे रहे हैं।
करीब 11 महीने पहले रामनिवास रावत ने हाईकोर्ट में विजयपुर विधानसभा उपचुनाव को चुनौती देते हुए चुनाव याचिका दाखिल की थी। याचिका में मांग की गई है कि उपचुनाव को निरस्त किया जाए। रावत का आरोप है कि कांग्रेस प्रत्याशी रहे मुकेश मल्होत्रा ने नामांकन पत्र और चुनावी शपथ पत्र में गलत और अधूरी जानकारी दी। यह सीधे तौर पर चुनाव आयोग की नियमावली का उल्लंघन है और इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हुई।
रामनिवास रावत छह बार कांग्रेस विधायक रह चुके हैं। अप्रैल 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने भाजपा का दामन थामा और उन्हें वन एवं पर्यावरण मंत्री बनाया गया।मंत्री बनने के चार महीने बाद विजयपुर विधानसभा उपचुनाव हुआ, जिसमें उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी मुकेश मल्होत्रा से 7364 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। हार के बाद रावत ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और कुछ समय बाद उपचुनाव को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिका के मुताबिक मुकेश मल्होत्रा ने अपने चुनावी हलफनामे में केवल दो आपराधिक मामलों की जानकारी दी, जबकि उनके खिलाफ कुल छह आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। इनमें से कुछ मामलों में उन्हें छह महीने की सजा और जुर्माना भी हो चुका है।
इसके अलावा मारपीट, गाली-गलौज जैसे गंभीर अपराधों के प्रकरण भी दर्ज हैं, जिनका उल्लेख शपथ पत्र में नहीं किया गया। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह मतदाताओं को गुमराह करने का गंभीर मामला है और इससे चुनाव की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं।