टीकमगढ़ से मनीष असाटी। टीकमगढ़ शहर से करीब 40 किमी दूर और बड़ागांव धसान से महज 6 किमी दूर स्थित नवागढ़ तीर्थ क्षेत्र का इतिहास काफी पुराना है। यहां कभी भी खुदाई बड़ी सावधानी से की जाती है क्योंकि आमतौर पर यहां हर चौथी जगह प्रतिमाएं मिलती रहती हैं। हाल ही में रुपसिंह गुर्जर के खेत में खुदाई के दौरान पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा मिली थी। इस क्षेत्र में जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर अरनाथ स्वामी विराजमान हैं। यह ऐसा क्षेत्र है, जहां आज भी जैन धर्म के भगवान ऋषभदेव से महावीर स्वामी तक के बारे में जानकारी मिलती है।

वर्ष 1959 से लेकर आज तक कई इतिहासकार लगातार खोज में लगे हुए हैं। फिलहाल कुंवर वीरसिंह विश्वविद्यालय आरा (बिहार) से अर्पिता रंजन (अभिलेख सहायक, पुरातत्व विभाग लालकिला दिल्ली) यहां की विरासत पर शोध कर रही हैं। रोचक यह भी है कि इस गांव में जैन समाज का कोई परिवार नहीं रहता है। यहां पर सभी समाज के लोग अरनाथ स्वामी की पूजा करते हैं। शादी समारोह होने पर यहीं पूजा होती है। स्थानीय निवासी जय निशांत भैया बताते हैं कि वर्ष 1959 में कुछ जैन व्यापारी इस क्षेत्र से निकले और नावई के पास उन्होंने इमली के पेड़ के नीचे कुछ खंडित जैन प्रतिमाओं को देखा। ग्रामीण उनकी पूजा कर रहे थे।

कुछ समय बाद उस स्थान की सफाई की गई, तो वहां भूगर्भ से 900 साल प्राचीन प्रतिमाएं निकलीं। वहां 4.5 फीट की खड्गासन भगवान अरनाथ की प्रतिमा भी थी। इसके बाद ही इस क्षेत्र का विकास किया गया। यहां कुछ शिलालेख व प्रतिमाएं 12वीं और आठवी शताब्दी की मानी जाती हैं। अब तक 114 मूर्तियां यहां खुदाई में मिल चुकी हैं, जिनमें से करीब 25 मूर्तियां ही साबुत मिली हैं, बाकी खंडित हैं।

विशेष पर्यटन स्थल होने के साक्ष्य मिले : जय निशांत भैया ने बताया कि नवागढ़ (नंदपुर) गुप्तकालीन नगर है, जिसका विकास प्रतिहार काल एवं चंदेलकाल में हुआ था। महोबा से लेकर देवगढ़ तक पूरा बुंदेलखंड ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है। उन्होंने बताया कि नवागढ़ में होने वाली खोज यहां की समृद्ध संस्कृति, इतिहास, राजनीतिक संबद्धता और ग्रामीणों की खुशहाली को दर्शाता है। फाइटोन पहाड़ी के पास निकट जैन पहाड़ी पर स्थित संघ साधना स्थल, गुफाओं में उकेरी गई आकृति और चरण चिह्न यहां जैन विरासत का साक्षात्कार कराते हैं। रॉक पेंटिंग, कपमार्ग, हैंगिंग रॉक, बैलेंस रॉक, मैटेलिक साउंड रॉक इसके विशेष पर्यटन स्थल होने का साक्ष्य हैं।

लाखों वर्ष पुराने पाषाण और औजार खोज निकाले : दयालबाग इंस्टीट्यूट आगरा की रॉक आर्ट सोसायटी ऑफ इंडिया के जनरल सेक्रेटरी डॉ. गिरिराज कुमार ने 29 जनवरी 1917 से इस क्षेत्र के 10 किमी में स्थित विभिन्ना पहाड़ियों का सतत अन्वेषण करते हुए दो से पांच लाख वर्ष प्राचीन प्री, मिडिल एवं पोस्ट मेचुलियन काल के पाषाण औजार खोज निकाले थे। ये आज भी नवागढ़ के संग्रहालय में संग्रहित हैं।

शराब पीने पर हो जाता है बहिष्कार गांव के रामनाथ गुर्जर, रामनारायण यादव, बंदू कुशवाहा बताते हैं कि गांव में भगवान अरनाथ स्वामी को सर्व समाज के लोग पूजते हैं। मुनिश्री सरलसागर महाराज के प्रवचन सुनने के लिए पहुंचते हैं। गांव में शराब का विक्रय नहीं होता है और न ही गांव में शराब का सेवन किया जाता है। सरपंच लखनलाल अहिरवार ने कहा कि अगर कोई शराब का सेवन करता है, तो उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाएगा, ऐसा फैसला ग्रामीणों ने किया है। लेकिन ऐसी स्थिति बनी नहीं है, क्योंकि शराब का सेवन करने के बाद गांव में कोई नहीं आता है।