
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। मानसून की अधिकारिक विदाई बुधवार को हो जाएगी। 30 सितंबर के बाद होने वाली किसी भी वर्षा को मौसम विभाग मानसूनोत्तर वर्षा (आफ्टर रैनी सीजन) की श्रेणी में दर्ज करेगा। लेकिन इस बार मानसून की विदाई शहर के लिए राहत नहीं, बल्कि एक भीषण जल संकट का अलार्म बजाकर जा रही है। सात लाख की आबादी की प्यास बुझाने वाले गंभीर बांध में इस समय जल संकट का सन्नाटा पसरा है।
2250 एमसीएफटी की क्षमता वाले इस बांध में फिलहाल महज 715 एमसीएफटी पानी ही बचा है- यानी बांध 68 प्रतिशत खाली है। ऊपर से वाष्पीकरण और रोजमर्रा की सप्लाई के चलते बांध से हर दिन 7 से 8 एमसीएफटी पानी तेजी से घट रहा है।
इस हिसाब से गंभीर बांध में अगले 90 दिन नियमित जल प्रदाय करने जितना पानी ही उपलब्ध है। जीवाजी वेधशाला के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि इस सीजन में औसत 906 मिमी के मुकाबले महज 682 मिमी (75 प्रतिशत) बारिश हुई- यानी सीधी 25 प्रतिशत की बड़ी गिरावट। उज्जैन में करीब एक दशक (10 साल) बाद ऐसे सूखे जैसे हालात बने हैं।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के समक्ष अगस्त में पेश की गई संयुक्त समिति की रिपोर्ट के अनुसार, उज्जैन शहर की मौजूदा जलापूर्ति का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा अकेले गंभीर बांध से पूरा होता है। अल्प वर्षा के कारण बांध में क्षमता का एक-तिहाई पानी ही बच पाना आने वाले शीतकाल और ग्रीष्मकाल के लिए बड़े संकट की दस्तक है।
अल्प बारिश की वजह से भूजल रिचार्ज भी नगण्य रहा है। आशंका जताई जा रही है कि जो कुएं, हैंडपंप और बोरिंग अमूमन मई-जून की भीषण गर्मी में सूखते थे, वे इस बार शीतकाल समाप्त होते-होते (फरवरी-मार्च में) ही दम तोड़ देंगे। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि रबी फसलों (गेहूं और चना) के लिए मिट्टी में आवश्यक शुरुआती नमी नहीं मिलेगी। फसलों के उत्पादन में गिरावट का सीधा असर किसान की जेब और अंततः शहर के व्यापार पर पड़ेगा।
गंभीर बांध में जलस्तर घटने पर नर्मदा-आधारित जल प्रदाय योजना उज्जैन के लिए लाइफलाइन बनती है। लेकिन नर्मदा का पानी शहर तक लाना वित्तीय रूप से अत्यधिक खर्चीला है। पंपिंग, बिजली और रखरखाव का लगातार भारी खर्च उठाना पड़ता है। वर्तमान में नर्मदा जल की लागत 22.60 प्रति घन मीटर है। यह दर वर्ष 2014 से लागू है, जिसे अब तक बढ़ाया नहीं गया है।
बीते 12 वर्षों में नर्मदा का पानी उज्जैन लाने और गंभीर में खाली स्थान भरने के मद में अरबों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। कम वर्षा का सीधा अर्थ है कि नगर निगम और प्रशासन को आगामी दिनों में वैकल्पिक नर्मदा जल पर निर्भरता बढ़ानी होगी, जिससे सरकारी खजाने पर वित्तीय दबाव कई गुना बढ़ जाएगा।
एनजीटी की रिपोर्ट में सिंहस्थ 2028 के दौरान उज्जैन की अनुमानित जल मांग 410 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) बताई गई है। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि मेला अवधि में आने वाली करोड़ों की तैरती आबादी की प्यास बुझाना सामान्य दिनों से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होगा।
इस वर्ष का मानसून केवल एक मौसमी आंकड़ा नहीं, बल्कि उज्जैन की अगले दो वर्षों की जल प्रबंधन नीति का शुरुआती अलर्ट है। यदि आने वाले दिनों में मानसूनोत्तर वर्षा से राहत नहीं मिलती, तो प्रशासन को समय रहते जल वितरण, सीवरेज रिसाइकलिंग और भूजल संरक्षण की आपातकालीन योजना पर काम शुरू करना होगा।
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