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आठ साल बाद ज्येष्ठ अधिकमास, उज्जैन में सिंहस्थ से पहले दिखेगा कुंभ जैसा नजारा

पंचांग के अनुसार साल भर में ऐसे कई दिन रहते हैं, जब तिथि घटती बढ़ती है। तिथियों की इन्हीं घट बढ़ से अधिक मास की संरचना होती है।

By Digital DeskEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Sun, 05 Apr 2026 12:02:10 PM (IST)Updated Date: Sun, 05 Apr 2026 12:07:53 PM (IST)
आठ साल बाद ज्येष्ठ अधिकमास, उज्जैन में सिंहस्थ से पहले दिखेगा कुंभ जैसा नजारा
मंदिर में विराजित भगवान शेषनारायण की मूर्ति।

HighLights

  1. अधिक मास का अर्थ है अतिरिक्त महीना, जो तिथियों की घट-बढ़ से बनता है
  2. ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक माह में 15-15 दिन के दो पक्षकाल होते हैं
  3. तिथियों का गणित घंटे, मिनट, घटी, पल, कला, विकला आदि की गणना पर निर्भर

नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। पंचांग की गणना के अनुसार आठ साल बाद 2 मई से ज्येष्ठ अधिकमास का आरंभ होगा। पुरुषोत्तम मास में चौरासी महादेव, नौ नारायण व सप्त सागरों के दर्शन व पूजन की मान्यता है। इसके चलते देशभर से हजारों श्रद्धालु उज्जैन पहुंचेंगे।

धर्मधानी में सिंहस्थ से पहले महाकुंभ जैसा नजारा दिखाई देगा। हालांकि इन दिनों तीर्थों की हालत ठीक नहीं है। बता दें इससे पहले ज्येष्ठ अधिक मास का संयोग वर्ष 2018 में बना था।

ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला ने बताया ज्येष्ठ मास का आरंभ 2 मई को तथा समापन 29 जून को रहेगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार 2 से 16 मई तक ज्येष्ठा मास का प्रथम कृष्ण पक्ष रहेगा। 17 मई से 15 जून तक अधिकमास का पुण्य पर्वकाल रहेगा।


इसी दौरान तीर्थाटन, स्नान,दान, कथा भागवत का श्रवण आदि का महत्व है। 16 से 29 जून तक ज्येष्ठा मास चौथा और आखिरी शुद्ध पखवाड़ा रहेगा। पं.डब्बावाला ने बताया हर बार ज्येष्ठ अधिक मास 32 महीने 16 दिन तथा चार घड़ी के बाद बनता है।

क्या है अधिक मास

अधिक मास का अर्थ है अतिरिक्त महीना, जो तिथियों की घट-बढ़ से बनता है। पं. डब्बावाला ने बताया भारतीय ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक माह में 15-15 दिन के दो पक्षकाल होते हैं। प्रथम 15 दिन कृष्ण पक्ष तथा दूसरे 15 दिन शुक्ल पक्ष कहलाते हैं। प्रतिदिन तिथियों का गणित घंटे, मिनट, घटी, पल, कला, विकला आदि की गणना पर निर्भर रहता है। साल भर में ऐसे कई दिन रहते हैं, जब तिथि घटती बढ़ती है। तिथियों की इन्हीं घट बढ़ से अधिक मास की संरचना होती है।

पुराणों में अधिक मास का महत्व

विष्णु धर्मेत्तर पुराण में अधिक मास का विशेष महत्व बनाया गया है। पुराण के अनुसार अधिक मास में गुरु दीक्षा लेना, इष्ट की आराधना करना, तीर्थ स्नान व दान पुण्य करना, भागवत कथा का श्रवण करना, भगवत भजन करना, तीर्थ पर कल्पवास करना चाहिए। अधिक मास में सबसे अधिक महत्व भगवान विष्णु की आराधना का बताया गया है। पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु की आराधना करने से महापुण्य की प्राप्त होती है।

सप्त सागरों की हालत खराब...

तीर्थपुरी अवंतिका में जितना महत्व मोक्षदायिनी शिप्रा का है, उतना ही महत्व सप्त सागरों का है। सिंहस्थ के कारण सरकार शिप्रा की सुध तो ले रही है। लेकिन सप्त सागरों की हालत खस्ता है। सागरों की भूमि पर कब्जे हो रहे हैं। इससे इनका क्षेत्रफल कम होता जा रहा है।

पुष्कर सागर तो सिर्फ 15 फीट चौड़ा बचा है। बुधवारिया स्थित पुरुषोत्तम सागर भी उन्नयन की बाट जो रहा है। क्षीर सागर, रत्नाकर सागर, सोलह सागर पर भी साफ सफाई व श्रद्धालुओं की सुविधा के इंतजाम होना चाहिए।

जीर्णशीर्ण हो रहे धार्मिक महत्व के विष्णु मंदिर

धर्मधानी उज्जैन में जिस प्रकार सप्त सागर, चौरासी महादेव का महत्व है, उसी प्रकार नौ नारायण का भी अपना विशेष महत्व है। हर तीन साल में आने वाले अधिक मास में देशभर से हजारों भक्त यहां नौ नारायण के इन प्राचीन मंदिरों में दर्शन पूजन करने आते हैं।

क्षीर सागर के तट पर भगवान विष्णु के तीन प्राचीन मंदिर है। इनमें से कुछ जमींदोज होने की कगार पर हैं। जीर्णशीर्ण अवस्था में ही पुजारी भगवान की सेवा पूजा कर रहे हैं। सरकार को धार्मिक व पौराणिक महत्व के इन मंदिरों के जीर्णोद्धार पर भी ध्यान देना चाहिए।

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