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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 17, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Naidunia Flashback: अटलजी की सभा भी काम नहीं आई, भाजपा प्रत्याशी हारा

Naidunia Flashback: 1985 में हुए चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने क्षीरसागर में भाजपा प्रत्‍याशी के समर्थन में सभा की थी, लेकिन भाजप...और पढ़ें

By Bharat MandhanyaEdited By: Bharat Mandhanya
Publish Date: Sun, 17 Sep 2023 09:07:06 AM (IST)Updated Date: Sun, 17 Sep 2023 09:07:06 AM (IST)
Naidunia Flashback: अटलजी की सभा भी काम नहीं आई, भाजपा प्रत्याशी हारा
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी भाजपा प्रत्‍याशी के समर्थन में सभा

HighLights

  1. 1985 में हुए थे चुनाव
  2. अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी भाजपा प्रत्‍याशी के समर्थन में सभा
  3. भाजपा प्रत्‍याशी को चुनाव में हार का करना पड़ा सामना

Naidunia Flashback: बात 1985 की है। मेरे सामने चुनाव मैदान में मेरे अच्छे मित्र प्रकाश वोहरा थे। भाजपा ने उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया था। हम दोनों गहरे दोस्त थे। एक-दूसरे के राज भी जानते थे, फिर भी आमने-सामने होने के बाद भी कभी मर्यादा नहीं लांघी। उस समय चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाता था। भाषण में हल्के शब्दों या यूं कहे निचले स्तर की भाषा का प्रयोग नहीं होता था। स्थानीय मुद्दों का ही महत्व था कि विरोधी दल के समर्थन में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने क्षीरसागर में सभा ली लेकिन वह भी काम नहीं आई और उनका प्रत्याशी हार गया।

अब हो जाती है नेताओं की खरीद-फरोख्‍त

उस समय उज्जैन में पानी की बड़ी समस्या थी। ऐसे वक्त में कांग्रेस ने उज्जैन उत्तर विधानसभा क्षेत्र के विधायक और प्रदेश के उद्योग मंत्री राजेंद्र जैन का टिकट काटकर मुझे प्रत्याशी बनाया। तब मैं युवा कांग्रेस में था। भाजपा के प्रकाश वोहरा मेरे दोस्त थे इसलिए मिलते-जुलते रहे और लोगों के बीच भी जाते रहे। एक बार मेरे खिलाफ पर्चे बंटे तो प्रकाश से फोन पर ही चर्चा हो गई और मामला निपट गया। चुनाव के दौरान यह भी तय हुआ कि दोनों दोस्त एक साथ जनसंपर्क करेंगे, मगर कुछ लोगों के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया। अब तो नेताओं की खरीद-फरोख्त हो जाती है।


मेरे चुनाव में मित्रों का खूब सहयोग मिला। रामनिवास गोयल तब मेरे चुनाव संचालक थे। उन्होंने नाममात्र की राशि में चुनाव लड़ाकर मुझे जितवा दिया था। जो रुपया बचा था वो लौटा दिया था। तब बुनियादी जरूरत चुनावी मुद्दा हुआ करती थी, अब तो लोकलुभावन मुद्दों पर चुनाव लड़ा जा रहा है।

आज स्थिति पूरी तरह अलग

उस समय चुनाव प्रचार के लिए दीवारों पर पार्टी का नारा लिखने, पार्टी के चिह्न वाली टोपी पहनने, शर्ट पर बिल्ले लगाने की परंपरा थी। अब तो पूरे शहर को बड़े-बड़े होर्डिंग से पाट दिया जाता है। प्रचार के लिए इंटरनेट मीडिया, ढेर सारे टीवी चैनल, अखबार हैं। तब मोबाइल नहीं था, फिर भी भारी संख्या में लोग रैली, जनसभा में जुटते थे। लोग संबंध और व्यक्तिगत छवि देखकर वोट दिया करते थे। आज स्थिति पूरी तरह अलग हो गई है।

प्रस्तुतिः धीरज गोमे