
नईदुनिया प्रतिनिधि उज्जैन : मानसून की बेरुखी और कम वर्षा के चलते उज्जैन को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने की प्रक्रिया के बीच सिंहस्थ-2028 के लिए पर्याप्त पानी जुटाना और शिप्रा को स्वच्छ बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है। कम बारिश, गंभीर बांध में सीमित जल भंडार और भूजल के कमजोर पुनर्भरण ने चिंता बढ़ाई है।
फिलहाल नर्मदा के पानी से शहर की पेयजल व्यवस्था को सहारा मिल रहा है, लेकिन सिंहस्थ के गर्मी में होने वाले स्नान पर्वों के लिए पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए दीर्घकालिक इंतजाम जरूरी हैं। इसी उद्देश्य से 1133.67 करोड़ रुपये की हरियाखेड़ी जल आवर्धन योजना के साथ सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी जल संग्रहण और कान्ह डायवर्जन परियोजनाएं महत्वपूर्ण हैं।
2250 एमसीएफटी क्षमता वाले गंभीर बांध में 28 अक्टूबर को 594 एमसीएफटी पानी होने के आंकड़े के अनुसार जल भंडार क्षमता का करीब 26 प्रतिशत है। कम बारिश के कारण बांध पर्याप्त नहीं भर सका। शहर की पेयजल व्यवस्था को संभालने के लिए नर्मदा का पानी गंभीर बांध और गऊघाट जल शोधन व्यवस्था तक पहुंचाया जा रहा है।
इससे राहत मिल रही है, लेकिन उपलब्ध भंडार, नर्मदा से मिलने वाले पानी और शहर की रोजाना खपत के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। कम बारिश का असर भूजल पर भी पड़ सकता है। शहर के जिन इलाकों में लोग निजी बोरिंग और कुओं पर निर्भर हैं, वहां भूजल स्तर गिरने से पानी की उपलब्धता घट सकती है। इससे गर्मी में जल संकट बढ़ने और बोरिंग अधिक गहरी कराने की नौबत आ सकती है। ऐसे में सतही जल के साथ भूजल की स्थिति पर निगरानी भी जरूरी होगी।
हरियाखेड़ी जल आवर्धन परियोजना 1133.67 करोड़ रुपये की लागत से विकसित की जा रही है। इसका उद्देश्य सिंहस्थ के दौरान श्रद्धालुओं और शहरवासियों को पर्याप्त शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के साथ भविष्य की जरूरतों के लिए जलापूर्ति व्यवस्था मजबूत करना है।
योजना में 708 किलोमीटर पाइपलाइन, करीब 534 किलोमीटर नया वितरण नेटवर्क और 600 से 3000 किलोलीटर क्षमता की 17 नई पानी की टंकियां बनाई जानी हैं। इसके तहत नए इंटेकवेल और जल शोधन संयंत्रों की व्यवस्था भी प्रस्तावित है। परियोजना को 24 माह में चरणबद्ध पूरा करने का लक्ष्य बताया गया है। इससे वर्ष 2055 तक शहर की जलापूर्ति जरूरतों को पूरा करने की योजना है।
यह योजना शहर के घरों तक पेयजल पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करेगी, जबकि शिप्रा में स्नान के लिए पर्याप्त प्रवाह बनाए रखने की चुनौती अलग है। इसके लिए नदी में पानी सहेजने और प्रदूषित पानी को मिलने से रोकने वाली परियोजनाओं का समय पर पूरा होना जरूरी है।
614 करोड़ रूपये की सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी परियोजना में करीब 51 मिलियन घन मीटर यानी लगभग 1800 एमसीएफटी पानी संग्रहित करने की क्षमता विकसित की जा रही है। इसका उद्देश्य बरसात में शिप्रा का पानी सहेजकर जरूरत के समय नदी में छोड़ना है।
अक्टूबर में सामने आई प्रगति रिपोर्ट के अनुसार परियोजना का करीब 84 प्रतिशत काम पूरा हुआ था और मई 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य बताया गया था। हालांकि, जलाशय की क्षमता और उसमें वास्तव में जमा होने वाला पानी अलग-अलग बातें हैं।
अगली बरसात में कितना पानी सहेजा जा सकेगा, यह बारिश, जलग्रहण क्षेत्र से आने वाले प्रवाह और परियोजना के समय पर चालू होने पर निर्भर करेगा। इसलिए निर्माण पूरा करने के साथ जलाशय का परीक्षण और पानी के नियोजित उपयोग की व्यवस्था भी जरूरी होगी।
करीब 920 करोड़ रुपये की कान्ह डायवर्जन क्लोज डक्ट परियोजना का उद्देश्य कान्ह नदी का दूषित पानी शिप्रा में मिलने से रोकना है। लगभग 30.15 किलोमीटर लंबी इस परियोजना में भूमिगत सुरंग और क्लोज डक्ट का निर्माण शामिल है।
सिंहस्थ से पहले इसका पूरा होना जरूरी है, क्योंकि नदी में पर्याप्त पानी होने के साथ उसकी गुणवत्ता बनाए रखना भी बड़ी चुनौती है। कान्ह डायवर्जन के साथ दूसरे नालों के पानी का उपचार, सीवरेज व्यवस्था और शिप्रा की नियमित निगरानी भी जरूरी रहेगी। गर्मी के स्नान पर्वों में नदी का प्रवाह बनाए रखने के लिए जल संग्रहण और प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्थाओं को एक साथ प्रभावी करना होगा।
उज्जैन में सूखे की स्थिति के पीछे कम मानसूनी वर्षा, गंभीर बांध के जलग्रहण क्षेत्र में पर्याप्त पानी नहीं पहुंचना, जल स्रोतों में सीमित भंडार और कम बरसात से भूजल का कमजोर पुनर्भरण प्रमुख चुनौतियां हैं। इनका असर पेयजल, खेती और गर्मी में पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है। निजी बोरिंग और कुओं पर निर्भर इलाकों में भूजल गिरने से संकट बढ़ने की आशंका है। आधिकारिक कारणों की अंतिम पुष्टि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग से जरूरी है।
सिंहस्थ-2028 के लिए करीब 20 हजार करोड़ रुपये के 175 निर्माण कार्यों को अक्टूबर 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है। सड़कों, पुलों, घाटों और अन्य सुविधाओं के साथ पेयजल, सीवरेज और स्वच्छता व्यवस्था भी आयोजन की बुनियादी जरूरत होगी। निर्माण कार्यों के दौरान पानी की मांग बढ़ने के बीच शहर की नियमित जलापूर्ति प्रभावित न हो, इसकी योजना बनानी होगी। आयोजन की तैयारी की कसौटी केवल निर्माण पूरा करना नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए पर्याप्त पानी और स्वच्छ शिप्रा सुनिश्चित करना भी है।
सिंहस्थ से पहले जल प्रबंधन की सफलता इस बात से तय होगी कि अगली बरसात में कितना पानी सहेजा जाता है, हरियाखेड़ी योजना से शहर की आपूर्ति कितनी मजबूत होती है और कान्ह डायवर्जन के जरिए प्रदूषित पानी को शिप्रा में मिलने से कितना रोका जा सकता है।