
नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन : 907 करोड़ रुपये की लागत से बना उज्जैन-बदनावर फोरलेन हाईवे डेढ़ साल में ही मरम्मत की स्थिति में पहुंच गया है। तपोभूमि से चिंतामन क्षेत्र के बीच सड़क की ऊपरी सतह उखाड़कर मिलिंग और फिर डामरीकरण किया जा रहा है।
सड़क के हिस्से को खुरचकर दोबारा बनाने की नौबत ने निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) इसे सड़क की खराबी नहीं, बल्कि मानसून के बाद होने वाला नियमित मेंटेनेंस बता रहा है। प्राधिकरण के अनुसार, सीमित हिस्सों में सुधार कार्य के आधार पर पूरे प्रोजेक्ट को खराब गुणवत्ता वाला बताना उचित नहीं है।
उज्जैन-बदनावर फोरलेन करीब 69.1 किलोमीटर लंबा है। इसका निर्माण हाइब्रिड एन्युटी मॉडल (एचएएम) के तहत करीब 907 करोड़ रुपये की लागत से किया गया है। समझौते के अनुसार, निर्माण एजेंसी को अगले 15 वर्षों तक सड़क के रखरखाव और मरम्मत की जिम्मेदारी निभानी है। मौजूदा मरम्मत का खर्च भी एजेंसी ही वहन करेगी। एनएचएआइ का कहना है कि सिंहस्थ 2028 में सुगम यातायात सुनिश्चित करने के लिए सड़क की निगरानी और जरूरी सुधार किए जा रहे हैं।
हालांकि, सवाल यह है कि जिस सड़क का निर्माण करीब 907 करोड़ रुपये की लागत से हुआ और जिसे बने अभी डेढ़ साल ही हुए हैं, उसकी सतह को मिलिंग कर दोबारा डामरीकरण की जरूरत क्यों पड़ी? क्या इसकी वजह निर्माण सामग्री, डामर की गुणवत्ता, सड़क बिछाने की प्रक्रिया या मानसून का असर है?
एनएचएआई ने खराबी को सीमित हिस्सों तक बताया है, लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि कितने हिस्सों में सतह उखड़ी और मरम्मत की वास्तविक लंबाई कितनी है। तकनीकी जांच में खराबी की वजह क्या सामने आई, यह भी सार्वजनिक होना चाहिए। मरम्मत केवल पैचवर्क तक सीमित न रहे, बल्कि सड़क सिंहस्थ के दौरान और उसके बाद भी टिकाऊ बनी रहे, इसकी जवाबदेही तय होना जरूरी है।
एनएचएआई की ही उज्जैन-गरोठ फोरलेन परियोजना में प्रेमनगर आरओबी और कालियादेह पुल के पास निर्माण गुणवत्ता को लेकर पहले भी सवाल उठ चुके हैं। प्रेमनगर में फरवरी 2026 में आरओबी की रिटेनिंग वॉल धंस गई थी। जून में दोबारा निर्माण के बाद अगस्त में आरई वॉल के पैनल फिर खिसक गए।
आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों के निरीक्षण के बाद करीब 500 मीटर हिस्से को तोड़कर नए सिरे से बनाने का निर्णय हुआ। सितंबर में कालियादेह में भी रिटेनिंग वॉल के ब्लॉक खिसकने का मामला सामने आया। इन घटनाओं ने निर्माण एजेंसी के काम और निगरानी व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए थे। अब एनएचएआइ की उज्जैन-बदनावर परियोजना में भी डेढ़ साल के भीतर सड़क की सतह सुधारने की जरूरत ने गुणवत्ता निगरानी पर सवाल खड़े किए हैं।
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