
नईदुनिया प्रतिनिधि, उमरिया। गुरुवार को बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हर साल होने वाला कबीर मेला अगहन पुर्णिमा की सुबह शुरू हुआ जो शाम तक चला। इस दौरान देश के अलग-अलग प्रदेशों से बीस हजार से ज्यादा लोग ताला पहुंचे और लगभग पांच हजार लोगों ने बांधवगढ़ दर्शन यात्रा करके कबीर चौरा और गुफा के दर्शन किए। इसके लिए दूसरे प्रदेशों से आए दर्शनार्थी सुबह साढ़े सात बजे से ताला से बांधवगढ़ तक पैदल गए। उन्हें लगभग 15 किलोमीटर का यह सफर पैदल ही तय करना पड़ता है।
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व, उमरिया में प्रतिवर्ष अगहन पूर्णिमा पर आयोजित होने वाला कबीर मेला इस वर्ष भी श्रद्धा, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ आयोजित किया गया। टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में स्थित कबीर गुफा तथा कबीर चबूतरा के दर्शन करने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश सहित देशभर से कबीरपंथी तथा अन्य दर्शनार्थी यहां पहुंचे। इस वर्ष पार्क प्रबंधन ने मेले की सभी तैयारियां पहले ही पूर्ण कर ली थी।
एनजीटी के निर्देशानुसार इस वर्ष कबीर गुफा के दर्शन हेतु टाइगर रिजर्व क्षेत्र में यात्रा करने वाले सभी श्रद्धालुओं का पंजीकरण ऑनलाइन किया गया है । प्रातः 6 बजे से 7:30 बजे तक ऑनलाइन पंजीयन के सत्यापन उपरांत सभी मेला में आए लोगों को टाइगर रिजर्व में प्रवेश हेतु टोकन प्रदान किया गया । तत्पश्चात प्रातः 7:30 बजे से 10:30 बजे तक कबीर गुफा में जाने हेतु प्रवेश दिया गया। शाम 3:30 बजे तक सभी दर्शनार्थियों को मेन गेट ताला से वापस लौटना शुरू कर दिया गया था।
क्षेत्र संचालक, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व, उमरिया द्वारा यात्रा की पूर्व तैयारियों की समीक्षा की गई थी और सभी अधीनस्थों को यात्रा के समय अपनी ड्यूटी मुस्तैदी से करने के निर्देश दिए गए थे। पुलिस और वन विभाग के लगभग पांच सौ कर्मचारी सुरक्षा के लिए तैनात रहे। सभी दर्शनार्थियों से भी पार्क प्रबंधन द्वारा यात्रा के दौरान सजग रहने, नियमों का पालन करने तथा यात्रा को पॉलीथिन मुक्त रखने की अपील की गई थी।
प्रथम वंशगुरु पूज्यनीय हुजुर चुड़ामणि नाम साहेब के प्राकट्य दिवस अघहन पूर्णिमा के अवसर पर बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में प्रति वर्ष 'बांधवगढ़ दर्शन यात्रा' के रूप में विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। वर्तमन में वंश परंपरा प्रणाली के गददी में विराजमान 15 वें वंश गुरु पंथ हुजुर प्रकाशमुनि नाम साहेब के सानिध्य में हजारों की संख्या में साधु संत महंत एवं भक्त बांधवगढ़ दर्शन यात्रा कर सदगुरु कबीर साहेब गुफा मंदिर, धर्मदास साहब एवं आमीन माता मंदिर, कबीर चबूतरा (उपदेश स्थल) कबीर तलइया के दर्शन का लाभ लेते हैं।
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघों की दहाड़ तो गूंजती है लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता है कि इसी जंगल में कभी कबीर की संतवाणी भी गूंजा करती थी। कबीर साहेब अपने शिष्य धर्मदास साहेब के भाव पूर्वक आमंत्रण पर बांधवगढ़ आए थे और यहीं से बाद में वे अमरकंटक भी गए थे।
उनके आगमन के प्रमाण के तौर पर बांधवगढ़ और अमरकंटक दोनों ही स्थानों पर कबीरा चौरा बना हुआ है। बांधवगढ़ की गुफा में बैठकर कबीर साहेब ने कई दोहों और पदों की रचना की जो बाद में उनके शिष्यों द्वारा संग्रहित ग्रंथ में शामिल हुए।
कबीर ने इसी जंगल के अंदर पहाड़ पर स्थित किले में कबीर तलैया के किनारे बैठकर सत्संग किए और प्रमुख कबीर साहित्य की रचना भी की। कबीरपंथी हरिभाई बताते हैं कि कबीर साहित्य के प्रमुख ग्रंथ ग्रंथ-बीजक, कबीर सागर, शब्दावली आदि ग्रंथों में शामिल दोहे, पद और रमैनी की रचना बांधवगढ़ में ही हुई है।
कबीर साहेब अपने शिष्य धर्मदास साहब, माता आमिन, श्रुतिगोपाल साहेब, हंसोबाई, चूरामणि नाम साहेब, जागु साहेब, भगवन साहेब और राजा वीरसिंह देव, रानी इंदुमती, रानी कमलावती तथा वीरभानु उर्फ़ रामसिंह आदि को सत्संग सुनाया करते थे। इस दौरान जब वे पद और दोहे गाते थे तो शिष्य उन्हें लिपिबद्ध कर लेते थे।
कबीर के शिष्य धर्मदास साहेब ने भाव पूर्वक सदगुरु कबीर को बांधवगढ़ आने का न्योता दिया था जिसके बाद वे विक्रम संवंत 1420 में बांधवगढ़ आए थे। इसका उल्लेख कबीरपंथ के सदग्रंथ में एक चौपाई के रूप में मिलता है। हिंदी साहित्य के विद्वान डा शरद मिश्रा बताते हैं कि बांधवगढ़ और अमरकंटक में कबीर चौरा इसी बात का प्रमाण है कि कबीर यहां आए थे और उन्होंने यहां सत्संग किया था। डॉ. शरद मिश्रा ने बताया कि बांधवगढ़ कबीर पंथ के संस्थापक धनि धर्मदास की साधना भूमि रही है। यहीं वाचनवंश चुड़ामुनिनाम साहब का आविर्भाव, गुरुदीक्षा गुरुगद्दी तिलक हुआ था, इसलिये यह स्थान कबीर पंथ का उद्भव स्थल भी कहलाता है।