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विंध्य से मैकल तक कल्चुरियों ने रचा गणपति का भव्य संसार, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के घने जंगल में भी मौजूद है गणपति की विशाल प्रतिमा

गणपति की भक्ति की यह कहानी सिर्फ मंदिरों तक सीमित नहीं है। विंध्य से मैकल तक फैले भूभाग में कल्चुरियों ने भगवान गणेश की ऐसी भव्य प्रतिमाएं स्थापित करा...और पढ़ें

By SanjayKumar SharmaEdited By: manoj dubey
Publish Date: Mon, 14 Sep 2026 07:07:49 PM (IST)Updated Date: Mon, 14 Sep 2026 07:08:57 PM (IST)
विंध्य से मैकल तक कल्चुरियों ने रचा गणपति का भव्य संसार, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के घने जंगल में भी मौजूद है गणपति की विशाल प्रतिमा

HighLights

  1. शहडोल नगर प्राचीन विराट नगर के रूप में जाना जाता है
  2. सभी पांच प्रतिमाएं एक ही कद और एक ही पैटर्न की
  3. मैकल की तराई धरहरा में गणपति की विशाल प्रतिमा

संजय कुमार शर्मा, नईदुनिया उमरिया। गणपति की भक्ति की यह कहानी सिर्फ मंदिरों तक सीमित नहीं है। विंध्य से मैकल तक फैले भूभाग में कल्चुरियों ने भगवान गणेश की ऐसी भव्य प्रतिमाएं स्थापित कराईं, जो आज भी उनके कला-बोध, धार्मिक आस्था और स्थापत्य कौशल की गवाही दे रही हैं।

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के घने जंगल में मौजूद विशाल गणपति प्रतिमा इस विरासत का एक अनूठा उदाहरण है। शहडोल में भी कभी एक ही आकार की पांच भव्य गणपति प्रतिमाएं अलग-अलग मार्गों पर स्थापित कराई गई थीं, जो आज भी शहर के अलग-अलग हिस्सों में आस्था का केंद्र बनीं हुईं हैं।


अनूपपुर जिले के राजेंद्र ग्राम के निकट बैगढ़ धरहर की विशाल गणपति प्रतिमा भी कल्चुरीकालीन मूर्तिकला की समृद्ध परंपरा को सामने लाती है।

पांच मार्ग पर पांच गणपति प्रतिमाएं

शहडोल नगर प्राचीन विराट नगर के रूप में जाना जाता है, यहां पहुंचने वाले सभी पांच मार्गों पर भगवान गणपति की प्रतिमा की स्थापना की और बावड़ियां बनवाई। यह सभी वे मार्ग थे जो कल्चुरी शासकों के आधिपत्य वाले क्षेत्र को आपस में जोड़ते थे। इसमें कंकाली देवी मंदिर की बावड़ी और गणपति की प्रतिमा शामिल है।

प्रतिमा अब सोहागपुर कन्या स्कूल के पीछे स्थापित है

यहां स्थापित की गई प्रतिमा अब सोहागपुर कन्या स्कूल के पीछे स्थापित है। दूसरी प्रतिमा और बावड़ी शहडोल आइटीआइ के सामने स्थित है। तीसरी प्रतिमा बाणगंगा में विराट मंदिर के पास सड़क पर स्थापित है जबकि बावड़ी विराट मंदिर के सामने है।

सभी पांच प्रतिमाएं एक ही कद और एक ही पैटर्न की

चौथी प्रतिमा कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मंदिर में स्थापित है जो किसी समय बूढ़ी देवी माता मंदिर में स्थापित हुआ करती थी। पांचवीं और प्रमुख प्रतिमा इंदिरा चौक मंदिर में स्थापित है और यहीं पीछे बावड़ी भी हुआ करती थी। यह सभी पांच प्रतिमाएं एक ही कद और एक ही पैटर्न की हैं।

मैकल की तराई धरहरा में गणपति की विशाल प्रतिमा

इसी तरह अमरकंटक के पहले मैकल की तराई धरहरा में गणपति की विशाल प्रतिमा की स्थापना की और जल संरचना बनाई। धरहर की इस प्रतिमा के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि कल्चुरियों द्वारा स्थापित यह प्रतिमा धीरे-धीरे करके लगातार वृद्धि प्राप्त कर रही है।

जंगल के मध्य जहां प्रतिमा स्थापित है अब भव्य मंदिर बन गया है और अमरकंटक जाने वाले लोग इस मंदिर में दर्शन करने के लिए जरूर रूकते हैं। तीन बावलियां शेष जंगल, रास्तों और प्राचीन जलस्रोतों के बीच बिखरी ये प्रतिमाएं बताती हैं कि कल्चुरियों ने शैव परिवार की उपासना को अपनी कला और स्थापत्य की भाषा में विशेष स्थान दिया था।

इनमें से तीन बावलियां आज भी जीवित हैं

खास बात यह थी कि शहडोल नगर में स्थापित प्रत्येक प्रतिमा के साथ बावली का निर्माण भी कराया गया था। समय के थपेड़ों के बावजूद इनमें से तीन बावलियां आज भी जीवित हैं। यह बावलियां कंकाली देवी माता मंदिर अंतरा, बाणगंगा और आईटीआई के सामने स्थित हैं।

पानी के प्रति चिंतन का प्रमाण

इंद्राचौक गणेश मंदिर और बूढ़ीमाता मंदिर प्रांगण में भी एक-एक बावली होने का दावा किया जाता रहा है, लेकिन अब उनके अवशेष भी शेष नहीं हैं। पुरातत्त्ववेत्ता विद्यावाचस्पति स्व राजेश उपाध्याय नार्मदेय की कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख है कि कल्चुरियों ने जहां भी मंदिर बनाए और शैव परिवार की प्रतिमाओं की स्थापना कराई उन सभी स्थानों पर पेयजल संरचना का निर्माण भी कराया।

मंदिर और प्रतिमाओं के साथ जल संरचानाओं का निर्माण कल्चुरियों की पानी के प्रति चिंतन और जागरूकता को प्रदर्शित करता है।

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