
नवदुनिया प्रतिनिधि, विदिशा। ग्यारसपुर की ऐतिहासिक पहचान माने जाने वाले करीब 1100 साल पुराने माला देवी मंदिर को सहेजने की कवायद शुरू हो गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने मंदिर के संरक्षण और पुनर्निर्माण की योजना पर काम शुरू किया है। इसके तहत मंदिर में लगे पत्थरों की नंबरिंग की जा रही है।
प्रत्येक पत्थर को अलग पहचान देने के साथ उसकी मौजूदा स्थिति और स्थान का रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा, ताकि मंदिर को दोबारा स्थापित करते समय उसकी मूल संरचना से छेड़छाड़ न हो। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार इस काम में केवल पत्थरों को चिह्नित करना ही पर्याप्त नहीं होगा।
मंदिर की दीवारों, प्रवेश द्वार और अन्य हिस्सों पर उकेरी गई प्राचीन नक्काशी का भी विस्तृत दस्तावेजीकरण किया जाएगा। इन दस्तावेजों में किस पत्थर पर कैसी कलाकृति है और वह मंदिर के किस हिस्से में लगा है, इसका विवरण सुरक्षित रखा जाएगा।
इसके बाद मंदिर को सावधानीपूर्वक खोलकर पत्थरों को सुरक्षित किया जाएगा। योजना के अनुसार, पहले नया प्लेटफॉर्म तैयार होगा और फिर पुराने पत्थरों को उनके निर्धारित क्रम में लगाकर मंदिर को दोबारा खड़ा किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में दो साल से अधिक समय लगने का अनुमान है।
माला देवी मंदिर ग्यारसपुर की पहाड़ी की ढलान पर स्थित है। इसका कुछ हिस्सा प्राकृतिक चट्टान को काटकर बनाया गया है, जबकि शेष संरचना पत्थरों से निर्मित है। प्रख्यात पुरातत्वविद् कृष्ण देवा के अध्ययन में मंदिर को नौवीं सदी के उत्तरार्ध का माना गया है। इसकी स्थापत्य शैली में प्रतिहारकालीन कला का प्रभाव दिखाई देता है।
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मंदिर के गर्भगृह, मंडप और बाहरी दीवारों पर जैन तीर्थंकरों, यक्ष-यक्षिणियों सहित अनेक आकृतियां उकेरी गई हैं। विशेष रूप से इसकी पत्थर की जालियों, स्तंभों और मूर्तिकला में तत्कालीन शिल्पकारों की दक्षता दिखाई देती है। मंदिर की प्रतिमाओं और स्थापत्य के अध्ययन से इसके मूल जैन मंदिर होने की पुष्टि होती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित यह स्मारक विदिशा जिले की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है।