
नवदुनिया प्रतिनिधि, विदिशा। किसी पर हजार रुपये का उधार हो तो वापसी के लिए विवाद की स्थिति बन जाती है लेकिन जिले के एक लाख 42 हजार लोगों के विभिन्न बैंकों में करीब 42 करोड़ रुपये जमा है लेकिन कोई वापस लेने नहीं आ रहा है। इधर, बैंको की स्थिति ये है कि उन्हें ढूंढने से भी खाताधारक नहीं मिल रहे है, क्योंकि बैंक खातों में न तो पता स्पष्ट है और ना ही नाम। जिसके चलते करोड़ों की राशि बैंको में अब भी पड़ी हुई है। जिले में साल भर में कुल 47 करोड़ में से सिर्फ पांच करोड़ रुपये की वापसी हो पाई है।
ये राशि भी सिर्फ सरकारी खातों में जमा हुई है। मालूम हो, रिजर्व बैंक ने दस वर्ष से बंद पड़े बैंक खातों की राशि को जमाकर्ता शिक्षा एवं जागरूकता कोष जमा करा दिया है। जिसे डीफ फंड कहा जाता है। पिछले साल नवंबर के महीने में केंद्र सरकार ने डीफ फंड में जमा राशि की लौटाने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसी के तहत जिले के विभिन्न बैंकों में 1 लाख 42 हजार 339 खाते ऐसे मिले थे, जिसमें करोड़ों की राशि जमा है। बीते वर्ष केंद्र और राज्य सरकार के दबाव के चलते फंड की राशि वापस लौटाने की प्रक्रिया में जिला प्रशासन ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। हर सप्ताह इसकी समीक्षा की गई।
इसके बावजूद भी सरकारी विभागों के ही कुछ बैंक खातों में राशि वापसी की प्रक्रिया पूर्ण हो पाई। इसके बाद प्रशासन की प्राथमिकता से भी यह विषय हट गया। जिसके चलते न तो कई सरकारी विभागों के खातों में राशि वापस आ पाई और ना ही निजी खाता धारकों के खातों में यह राशि वापस जमा हुई। जिसके चलते आज भी करीब 42 करोड़ की राशि रिजर्व बैंक के पास जमा है। 93 खातों में वापस जमा हुए पांच करोड़ जिले में अनक्लेम्ड रकम को वापस करने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद अब तक 93 खातों के करीब 5 करोड़ रुपये लौटाए जा चुके हैं।
इनमें बड़ी हिस्सेदारी सरकारी विभागों या संस्थाओं से जुड़े खातों की बताई जा रही है। इन खातों के वास्तविक धारक की पहचान और संबंधित विभाग की जानकारी बैंक के पास उपलब्ध होने से रकम वापस करना अपेक्षाकृत आसान रहा। इसमें भी जिला पंचायत सहित कुछ अन्य विभाग शामिल है, जिनके खातों में लाखों रुपयें जमा थे। सूत्रों का कहना है कि अब भी जिला शिक्षा केंद्र के अंतर्गत आने वाली संस्था के 45 खातों में लाखों रुपये जमा है। इसके अलावा रेशम केंद्र और जल संसाधन विभाग के अंतर्गत आने वाली जल समितियों में भी बड़ी राशि जमा है।
बैंक सूत्रों के अनुसार जिले में एक लाख 42 हजार कुल खातों में से 6020 खाते विभिन्न विभागों के तहत आने वाली सरकारी संस्थाओं के ही है। इन समितियों के बैंक खातों में लगभग पांच करोड़ रुपये वर्षों से जमा है। इनमें अधिकांश उन समितियों के खाते है, जो समिति अब अस्तित्व में भी नहीं है। ग्राम पंचायत, स्कूलों में गठित समितियों सहित अन्य सरकारी संस्थाओं में खाता संचालन करने वालों का निधन हो गया। कई लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं है। जिसके कारण रिजर्व बैंक में जमा राशि का कोई क्लेम ही नहीं हो रहा है।
लीड बैंक के ऑफिसर व्हीएस बघेल का कहना है कि सरकारी खाता धारकों को पैसा वापसी में ज्यादा दिक्कत नहीं है लेकिन निजी खाता धारकों को ढूंढना और उनकी पहचान करना बैंकों के लिए बहुत मुश्किल हो रहा है। उनके मुताबिक सभी बैंक खाते वर्षों पुराने है। जिसमें न तो खाता धारक का सरनेम के साथ नाम है और ना ही पिता का नाम है। पते के रूप में भी सिर्फ गांव का या शहर का नाम लिखा है। बघेल का कहना है कि बैंकों ने पंचायतों के माध्यम से भी खाता धारकों को ढूंढने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली।
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उनका कहना था कि अधिकांश खातों में खाता धारक दिवंगत भी हो चुके है। उनके स्वजन भी जागरूक नहीं है। जिसके कारण क्लेम की प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है। पोर्टल से भी घर बैठे ले सकते हैं पुराने खाते की जानकारीलीड बैंक ऑफिसर बघेल के मुताबिक अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके या परिवार के किसी सदस्य के नाम से वर्षों पुराना बैंक खाता या जमा राशि हो सकती है, तो आरबीआई के यूडीजीएएम पोर्टल पर भी खोज की जा सकती है।
यह पोर्टल विभिन्न बैंकों में पड़ी अनक्लेम्ड जमा राशि की जानकारी खोजने की सुविधा देता है। खोज के बाद संबंधित बैंक की जानकारी मिलने पर खाताधारक या उसका वैध उत्तराधिकारी बैंक से संपर्क कर दावा कर सकता है।