Independence day 2023 अजय जैन, विदिशा। आजादी के आंदोलन में विदिशा जिले की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यहां के युवाओं ने वर्ष 1942 में विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका था। मध्यप्रदेश में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत भी विदिशा से ही होना बताया जाता है।
अंग्रेजों के शासनकाल में सिंधिया रियासत का हिस्सा रहे विदिशा में कांग्रेस के बैनरतले किसी भी तरह की गतिविधियां प्रतिबंधित थी। तब विदिशा के लोगों ने प्रजामंडल और सार्वजनिक सभा के नाम से संगठन बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ गतिविधियां शुरू की थी। वर्ष 1930 में प्रजामंडल नाम के संगठन के माध्यम से दत्तात्रेय सरवटे ने और वर्ष 1937 में रामसहाय जी ने सार्वजनिक सभा के नाम से संगठन बनाकर अंग्रेजों की खिलाफत करना शुरू कर दिया था।
इतिहासकार गोविंद देवलिया बताते है कि अंग्रेजों ने घर पर कपड़ा बनाने वाले हथकरघा कारीगरों पर रोक लगा दी थी और कपड़ा विदेश से बुलाया जाने लगा था। जिसकी वजह से पूरे देश में विरोध का वातावरण था। वर्ष 1942 के अगस्त माह में विदिशा शहर में विदेशी वस्त्रों की जगह–जगह होली जलाई गई थी। इसके लिए युवाओं की टीम ने घर–घर से विदेशी कपड़े एकत्रित किए थे।
इस आंदोलन में गुना, उज्जैन, शुजालपुर सहित अन्य क्षेत्रों के आंदोलनकारी शामिल हुए थे। अंग्रेजों के खिलाफ प्रदेश में यह सबसे बड़ा आंदोलन था। इसके बाद अन्य क्षेत्रों में भी आंदोलन शुरू हो गए थे। वे बताते है कि इसी दौरान रघुवीर चरण शर्मा सहित अन्य लोगों को गिरफ्तार कर मुंगावली जेल भेजा गया था।
विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने के लिए आंदोलन का नेतृत्व क्षेत्र के प्रतिष्ठित वकील रामसहाय जी ने किया था। उनके पोते हरीश वर्मा बताते है कि 1937 में उनके ही घर पर एक बैठक हुई थी, जिसमें सार्वजनिक सभा का गठन कर अंग्रेजों के खिलाफ बड़ा आंदोलन करने की रूपरेखा तैयार हुई थी।
वे बताते है कि स्वतंत्रता के बाद उनके दादा मध्यभारत प्रांत के विधानसभा अध्यक्ष और फिर राज्य सभा सदस्य भी रहे। इसके अलावा वे संविधान बनाने वाली समिति के सदस्य भी रहे हैं।