हमारे देश में बच्चों में कुपोषण बहुत आम और बड़ी समस्या है। जरा सी सावधानी और सतर्कता से बच्चों को कुपोषित होने से बचाया जा सकता है। पैदा होने के बाद 6 महीनों तक बच्चों को केवल माता का ही दूध पिलाएं। यही सही पोषण की शुरुआत है।

बच्चों में आवश्यक संतुलित आहार की लंबे समय तक कमी बने रहना ही कुपोषण है। कुपोषण की समस्या सबसे ज्यादा 5 साल से कम उम्र के बच्चों में होती है। इस आयुवर्ग केबच्चों की मौत के लिए कुपोषण एक बड़ा कारण है। इसी वजह से हर 1000 में से 52 बच्चे कुपोषण की वजह से मर जाते हैं। क्या है नुकसान कुपोषण का कुपोषण के कारण बच्चों की रोगों से लड़ने की ताकत कम हो जाती है। कुपोषित बच्चा बड़ी आसानी से कई तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। कुपोषण का सीधा ताल्लुक संक्रमण या संक्रामक रोगों से है। कुपोषित बच्चे को संक्रमण हो जाए तो जानलेवा साबित होता है। बच्चों में अधिकांश रोगों की जड़ में कुपोषण ही होता है।

अक्सर यह भी देखा जाता है कि महिलाएं पूरे परिवार को खिलाकर स्वयं बचा हुआ रुखा-सूखा खाना खाती है। इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है, क्योंकि इसका असर उनके ही बच्चे पर पड़ता है।

कैसे करें बचाव

शिशु को पहले 6 महीनों तक केवल मां का दूध ही देना चाहिए। इस दौरान बच्चे को और कुछ भी नहीं देना चाहिए, क्योंकि मां के दूध में जो पोषक तत्व होते हैं वो किसी भी अन्यपदार्थ में नहीं हैं। शिशु के लिए यही संपूर्ण आहार है। बच्चे को भरपूर दूध मिले इसलिए जरूरी है कि मां स्तनपान की पूरी अवधि में भरपूर भोजन करती रहे। माता की सही खुराक से ही उसके शरीर में सही मात्रा में दूध बन पाएगा। बच्चा 6 महीने का हो जाए उसके बाद उसे मां के दूध के अतिरिक्त पतला दलिया, नारियल पानी, फलों के रस जैसी चीजें भी दी जा सकती हैं। उबली हुई सब्जियों का घोल अथवा दाल का पानी दिया जा सकता है।

क्यों होता है कुपोषण

लोगों को जानकारी नहीं है कि गर्भवती महिला की पोषण संबंधी जरूरतों को किस प्रकार के आहार से पूरा किया जाए। इन लोगों को संतुलित भोजन के बारे में जानकारी ही नहीं होती है। ऐसे में न तो मां को और न ही बच्चे को पूरा पोषण मिल पाता है। नतीजा होता है कि नवजात शिशु कुपोषित होता है और मां भी प्रसव के बाद कमजोर हो जाती है।

Posted By: Arvind Dubey

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