
डिजिटल डेस्क। भारत की सांस्कृतिक विविधता की जब भी बात होती है, तो कई ऐसे अनोखे पहलू सामने आते हैं जो किसी को भी हैरत में डाल दें। गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में स्थित जाम्बुर गांव इसका एक जीवंत और बेहतरीन उदाहरण है। प्रथम दृष्टि में यहां के बाशिंदे दिखने में पूरी तरह अफ्रीकी मूल के नजर आते हैं, लेकिन जब वे धाराप्रवाह गुजराती या स्पष्ट हिंदी बोलते हैं, तो हर कोई हैरान रह जाता है।
सदियों पूर्व अफ्रीका से भारत आकर बसे 'सिद्दी' अल्पसंख्यक समुदाय की नस-नस में भले ही अफ्रीकी विरासत दौड़ती हो, लेकिन इनका दिल पूरी तरह से भारतीय है। इन्होंने अपनी अफ्रीकी 'बांटू' परंपराओं को सहेजते हुए भारतीय संस्कृति को इस तरह आत्मसात किया है, जैसे दूध में मिठास घुल जाती है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, लगभग एक हजार वर्ष पूर्व जूनागढ़ के नवाब सिद्दी समुदाय के पूर्वजों को जहाजों पर कार्य करने हेतु अफ्रीका (विशेषकर युगांडा) से यहां लाए थे। शाही महल और अन्य ऐतिहासिक निर्माण कार्य संपन्न होने के पश्चात, नवाब ने उन्हें यहीं भूमि आवंटित कर स्थायी रूप से बसा दिया। प्रारंभ में ये अपनी मूल अफ्रीकी भाषा में ही संवाद करते थे, परंतु कालक्रम के साथ वे स्थानीय गुजराती परिवेश में ऐसे रमे कि आज उन्हें अपने प्राचीन अफ्रीकी अतीत या भाषा की विशेष स्मृति नहीं है।
इतिहासकारों के मतानुसार, सिद्दी समुदाय मूल रूप से अफ्रीका की प्रसिद्ध 'बांटू' जनजाति का वंशज है। माना जाता है कि पुर्तगाली व्यापारी इन्हें गुलाम या बंधुआ मजदूरों के रूप में हिंद महासागर के समुद्री मार्गों से भारत लाए थे। गुजरात जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के दस्तावेजों के अनुसार, पुर्तगालियों द्वारा इन्हें 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लाया गया था। वहीं कुछ इतिहासकार व शोधकर्ता इनकी भारत आमद 15वीं शताब्दी के मध्य की मानते हैं। इनके इस ऐतिहासिक सफर की दास्तान आज भी लोक गाथाओं में जीवित है।
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वर्तमान समय में सिद्दी समुदाय मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्यों में निवास करता है। गुजरात में बसे अधिकांश सिद्दी मुस्लिम धर्म के अनुयायी हैं, जबकि कर्नाटक के सिद्दी मुख्य रूप से हिंदू धर्म का पालन करते हैं। गुजरात के जूनागढ़ में इनकी सबसे सघन आबादी पाई जाती है। यहां के लोग आम बोलचाल में सहज रूप से गुजराती और हिंदी का प्रयोग करते हैं।
इनका पहनावा, रहन-सहन और महिलाओं का कांच व चांदी की चूड़ियों से श्रृंगार पूरी तरह स्थानीय परंपराओं के अनुकूल है। इनका खान-पान भी ठेठ गुजराती है, जिसमें बाजरे की रोटी और बैंगन-आलू की सब्जी मुख्य आहार है। हालांकि, किसी भी पर्व या मांगलिक अवसर पर इनका पारंपरिक 'धमाल' नृत्य और संगीत आज भी इनकी अफ्रीकी संस्कृति की अमिट छाप पेश करता है। रोजी-रोटी के लिए भी यह समुदाय इस पारंपरिक लोक नृत्य की प्रस्तुतियां देता है।
वर्ष 2003 सिद्दी समाज के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ बनकर आया, जब गुजरात सरकार ने इन्हें 'अनुसूचित जनजाति' (ST) की श्रेणी में शामिल किया। इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद इनके लिए उच्च शिक्षा, सरकारी सेवाओं और जनकल्याणकारी योजनाओं के द्वार खुल गए।
जमीनी स्तर पर बदलाव की बात करते हुए जाम्बुर गांव के निवासी बताते हैं कि अब उनके गांव में बिजली, स्वच्छ पेयजल और राशन जैसी मूलभूत सुविधाओं की कोई कमी नहीं है और समाज तेजी से विकास की मुख्यधारा से जुड़ रहा है।