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PMO परिसर नहीं अब 'सेवातीर्थ' कहिए... देश के कई राज्यों के राजभवनों का भी बदला नाम

PMO Seva Teerth: प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) अब 'सेवा तीर्थ' के नाम से जाना जाएगा। सरकार ने यह महत्वपूर्ण फैसला पीएमओ की कार्यशैली और जनसेवा के प्रत...और पढ़ें

By Dheeraj BelwalEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Tue, 02 Dec 2025 04:40:04 PM (IST)Updated Date: Tue, 02 Dec 2025 04:47:51 PM (IST)
PMO परिसर नहीं अब 'सेवातीर्थ' कहिए... देश के कई राज्यों के राजभवनों का भी बदला नाम
PMO परिसर नहीं अब 'सेवातीर्थ' कहिए। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) अब 'सेवा तीर्थ' के नाम से जाना जाएगा
  2. सरकार ने यह महत्वपूर्ण फैसला जनसेवा के प्रति समर्पण को देखते हुए लिया
  3. बदलाव का मुख्य उद्देश्य पीएमओ को जनता के लिए और अधिक सुलभ बनाना

डिजिटल डेस्क। केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के नाम और उसके प्रशासनिक ढांचे में बड़ा बदलाव करते हुए इसे ‘सेवा तीर्थ’ नाम देने का निर्णय लिया है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय जल्द ही अपने नए परिसर में स्थानांतरित होगा और उसी भवन को यह नया नाम दिया गया है।

उपनिवेशकालीन नामों से दूरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में सरकारी प्रतिष्ठानों के उपनिवेशकालीन प्रतीकों और नामों को बदलने का अभियान लगातार जारी है। पिछले वर्षों में राजभवनों का नाम बदलकर लोकभवन, राज पथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ, और प्रधानमंत्री आवास 7, रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर 7, लोक कल्याण मार्ग किया जा चुका है।


प्रशासनिक ढांचे में नई सोच

सरकार के अनुसार ये बदलाव महज नाम बदलने का प्रयास नहीं हैं, बल्कि शासन की मूल भावना को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश हैं जहां सत्ता और दूरी की बजाय सेवा, कर्तव्य और जवाबदेही को केंद्र में रखा जाए।

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नए बदलावों के तहत “सेंट्रल सेक्रेटेरिएट’’ की जगह अब “कर्तव्य भवन’’ प्रशासनिक केंद्र माना जाएगा। नार्थ और साउथ ब्लॉक के नए परिसर को “सेवा तीर्थ’’ नाम दिया गया है, जिसे नीतिनिर्माण का पवित्र स्थल बताया जा रहा है।

नाम बदलने का गहरा प्रतीकात्मक संदेश

सरकार का कहना है कि भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में नाम परिवर्तन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि मानसिकता में परिवर्तन लाने का माध्यम है। इमारतों और सड़कों के नए नाम सरकार के कामकाज में जनकेंद्रित सोच को दर्शाते हैं। इन छोटे-छोटे बदलावों से सरकार यह संदेश देना चाहती है कि लोकतंत्र की धुरी शक्ति नहीं, बल्कि जनता है, और शासन का लक्ष्य नियंत्रण के बजाय सेवा होना चाहिए।