
डिजिटल डेस्क, इंदौर। अपनी भाषा हिंदी में मौलिक शोध को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति के द्वितीय संस्करण की शुरुआत हो चुकी है। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब देश में शोध की गुणवत्ता और मौलिकता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ज्ञानवृत्ति के अंतर्गत शोधार्थियों को राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र सहित अन्य सामाजिक विज्ञान विषयों में एक हजार शब्दों का सिनाप्सिस भेजना होगा। इसके आधार पर सम्मानित निर्णायक मंडल मंथन कर विषय और शोधार्थी का चयन करेगा। इसी कड़ी में दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति पर भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के प्रोफेसर प्रमोद कुमार से विशेष चर्चा की गई।
दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति के बारे में प्रो. प्रमोद कुमार का मानना है कि यह एक अनुकरणीय और समय की मांग के अनुरूप पहल है। उन्होंने कहा कि देश में शोध की गुणवत्ता आज भी चिंता का विषय है। बड़ी संख्या में शोध केवल कॉपी-पेस्ट तक सीमित हैं, जिनमें मौलिक चिंतन का अभाव दिखाई देता है। विशेष रूप से भारतीय भाषाओं में स्थिति और गंभीर है, जहां अंग्रेजी नहीं जानने वाले भी मजबूरी में अंग्रेजी में शोध लिखते हैं।
प्रो. कुमार के अनुसार, देश में हर वर्ष लगभग 40 हजार शोध उपाधियां प्रदान की जाती हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश का देश और समाज की वास्तविक समस्याओं से कोई सीधा संबंध नहीं होता। कॉपी-पेस्ट आधारित शोध से शोधार्थी को डिग्री तो मिल जाती है, लेकिन उससे समाज का कोई भला नहीं होता। ऐसे माहौल में हिंदी भाषा में मौलिक शोध को बढ़ावा देने के लिए दैनिक जागरण की पहल प्रशंसनीय है।
शोधार्थियों से अपेक्षाओं पर बात करते हुए प्रो. प्रमोद कुमार कहते हैं कि शोध का मूल उद्देश्य नवीन ज्ञान की खोज या ज्ञात तथ्यों की युगानुकूल व्याख्या होना चाहिए। शोध विषय देश-दुनिया की वर्तमान समस्याओं के समाधान पर केंद्रित हों। शोध प्रश्न प्रासंगिक हों, डाटा संकलन में मौलिकता हो और संदर्भों का विवरण मानक पद्धति से प्रस्तुत किया जाए।
हिंदी में शोध लेखन के महत्व पर प्रो. कुमार कहते हैं कि देश की लगभग आधी आबादी हिंदी भाषी है और इससे भी बड़ी संख्या हिंदी समझती है। यह एक बहुत बड़ा बौद्धिक और सामाजिक बाजार है। वैज्ञानिक रूप से भी यह सिद्ध है कि व्यक्ति अपनी मातृभाषा में ही सबसे बेहतर मौलिक चिंतन कर पाता है। यही कारण है कि दुनिया के अधिकांश देश अपनी भाषा में शोध और नवाचार को बढ़ावा देते हैं।
प्रो. प्रमोद कुमार के अनुसार, शोध यदि देश और समाज की वर्तमान चुनौतियों से जुड़ा हो तो उसका लाभ तुरंत समाज को मिलता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग और दुरुपयोग, भारतीय ज्ञान परंपरा, साहित्य, संचार, सामाजिक और आर्थिक विषय ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर शोध की आज विशेष आवश्यकता है। कुल मिलाकर शोध की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक उपादेयता स्पष्ट होनी चाहिए।
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