
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। लाल किले के पास रविवार शाम हुए भयानक विस्फोट ने पूरी दिल्ली को हिला दिया। धमाके के बाद घायलों और मृतकों को आनन-फानन में लोकनायक (एलएन) अस्पताल लाया गया, जहां हर तरफ चीख-पुकार और सिसकियों की आवाज गूंज रही थी। अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में अफरा-तफरी का माहौल था, हर कोना दर्द और दहशत से भरा हुआ।
डॉक्टर और नर्सें तेजी से भाग-दौड़ कर रही थीं। स्ट्रेचर पर लाए जा रहे घायलों में किसी के सिर पर गंभीर चोट थी तो किसी के कपड़े खून से सने हुए थे। मरीज इतने अधिक थे कि एक ही बेड के पास तीन-तीन घायल पड़े थे। किसी का हाथ नहीं था, तो किसी का पैर उड़ गया था। एक युवक का चेहरा आधा झुलस गया था और उसकी आंख बाहर निकल आई थी। दो महिलाओं के पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। परिवारजन उन्हें गोद में उठाकर अस्पताल तक लाए। अस्पताल की ओर जाने वाले सभी रास्तों पर एंबुलेंस और पुलिस वाहनों के सायरन लगातार गूंजते रहे।
कोई मुझे मेरे बेटे के बारे में बता दो…
घायलों को अस्पताल पहुंचाने वाले एंबुलेंस ड्राइवर गौतम और मोहम्मद फैजान ने बताया कि वे करीब पांच शव लेकर आए, जिनमें से किसी का भी शरीर पूरा नहीं था। किसी का हाथ गायब था तो किसी का सिर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो चुका था। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक, कुल 28 घायलों को भर्ती किया गया है, जिनमें दो महिलाएं शामिल हैं। कई की हालत गंभीर बताई जा रही है और कुछ को वेंटिलेटर पर रखा गया है। डॉक्टरों ने बताया कि ज्यादातर घायलों के शरीर पर लोहे के छर्रे और विस्फोट की तीव्र लहरों के निशान हैं। एक महिला की हालत बेहद नाजुक है।
अस्पताल के बाहर चीखें, आंखों में डर और बेचैनी
अस्पताल के बाहर का नजारा और भी भयावह था। परिजन अपनों को खोजते हुए इधर-उधर भाग रहे थे। कोई नाम पुकार रहा था, कोई तस्वीर दिखा रहा था, तो कोई डॉक्टरों और सुरक्षाकर्मियों से जवाब मांग रहा था। एक महिला दरवाजे के पास बेसुध बैठी थी। उसका बेटा लाल किले के पास ठेला लगाता था। वह बार-बार रोते हुए कह रही थी कि “मेरा बेटा कहां है, कोई मुझे बता दो…” लेकिन किसी के पास जवाब नहीं था।
भागीरथी पैलेस में दवा का कारोबार करने वाले जगदीश कटारिया भी अपने बेटे अमर की तलाश में पहुंचे थे। उन्हें अंदर जाने नहीं दिया गया। वह हर किसी से पूछ रहे थे “उसने सफेद पैंट और काली जैकेट पहनी थी, किसी ने देखा क्या?” मगर कोई मदद नहीं कर पा रहा था।
अतिरिक्त डॉक्टर, नर्सें और रक्त की व्यवस्था
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अस्पताल प्रशासन ने तुरंत अतिरिक्त डॉक्टरों और नर्सों को ड्यूटी पर बुलाया। ब्लड बैंक में घायलों के लिए अतिरिक्त रक्त की व्यवस्था की गई। जन औषधि केंद्र से सभी आवश्यक दवाएं और जरूरी सामान मंगवाए गए।
अस्पताल पहुंचते ही दिल्ली पुलिस ने परिसर को घेर लिया। स्पेशल ब्रांच और फोरेंसिक टीम भी मौके पर पहुंची। आम लोगों की एंट्री रोक दी गई। जिनके मरीज पहले से भर्ती थे, केवल पहचान पत्र दिखाने के बाद ही उन्हें प्रवेश दिया गया। रात करीब 10 बजे तक एंबुलेंस के सायरन गूंजते रहे। अस्पताल के अंदर और बाहर अपने प्रियजनों की खबर जानने के लिए लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। हर चेहरा चिंता, डर और उम्मीद के बीच डूबा था। लाल किले के धमाके के बाद दिल्ली एक बार फिर दर्द और दहशत के साये में थी और एलएनजेपी अस्पताल की दीवारें आंसुओं, सिसकियों और उम्मीदों से भर चुकी थीं।