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SC on Reservation: 'माता-पिता दोनों IAS हैं, तो बच्चों को कोटा क्यों...', आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

देश में आरक्षण के विधिक लाभ और उसके सही हकदारों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर बेहद गंभीर और दूरगामी टिप्पणी की है।

By Digital DeskEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Sat, 23 May 2026 04:26:56 PM (IST)Updated Date: Sat, 23 May 2026 04:26:56 PM (IST)
SC on Reservation: 'माता-पिता दोनों IAS हैं, तो बच्चों को कोटा क्यों...', आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
आरक्षण और क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख।

HighLights

  1. आरक्षण और क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख
  2. 'माता-पिता दोनों आईएएस हैं, तो बच्चों को कोटा क्यों?'
  3. सामाजिक गतिशीलता पर शीर्ष अदालत की अहम टिप्पणी

डिजिटल डेस्क। देश में आरक्षण के विधिक लाभ और उसके सही हकदारों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर बेहद गंभीर और दूरगामी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान साफ कहा कि शैक्षणिक और आर्थिक रूप से सशक्तिकरण होने के बाद समाज में 'सामाजिक गतिशीलता' (Social Mobility) स्वतः आ जाती है। ऐसे में पिछड़े वर्गों के अत्यधिक उन्नत और संपन्न परिवारों के बच्चों को लगातार आरक्षण का लाभ दिए जाने पर अदालत ने कड़ा विधिक सवाल उठाया है।

मामले की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां की विधिक पीठ ने मौखिक टिप्पणी की, "अगर किसी छात्र के माता-पिता दोनों ही आईएएस (IAS) अधिकारी हैं, तो फिर उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए? जब माता-पिता स्वयं आरक्षण का विधिक लाभ उठाकर समाज के एक निश्चित उच्च स्तर तक पहुंच चुके हैं, तो उनकी अगली पीढ़ी को इस कोटे के दायरे से बाहर हो जाना चाहिए।"


कर्नाटक का वह मामला जो सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

यह पूरा कानूनी विवाद कर्नाटक के एक छात्र से जुड़ा है, जिसके माता-पिता दोनों ही राज्य सरकार के अच्छे पदों पर कार्यरत नियमित वेतनभोगी कर्मचारी हैं। मामले का विधिक व सांख्यिकीय घटनाक्रम इस प्रकार है:

विधिक व प्रशासनिक कड़ियां (Case Parameters) मामले की वास्तविक और कानूनी स्थिति (Ground Reality)
पद और चयन की स्थिति याचिकाकर्ता का चयन कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KPTCL) में आरक्षित वर्ग के तहत असिस्टेंट इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल) के पद पर हुआ था।
जाति और प्रमाण पत्र याचिकाकर्ता 'कुरुबा समुदाय' से आता है। जिला जाति और आय सत्यापन समिति ने उसकी जांच की थी।
वित्तीय विसंगति (आय सीमा) जांच में अधिकारियों ने पाया कि दोनों सरकारी कर्मचारी माता-पिता की संयुक्त वार्षिक आय ₹8,00,000 (आठ लाख रुपये) की विधिक सीमा से अधिक थी।
प्रशासनिक व न्यायिक निर्णय समिति ने उसे 'क्रीमी लेयर' (सम्पन्न वर्ग) में वर्गीकृत करते हुए 'जाति वैधता प्रमाणपत्र' देने से इनकार कर दिया और उसका पुराना जाति प्रमाण पत्र रद्द कर दिया।
हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सरकार के इस फैसले को सही ठहराया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में विधिक चुनौती दी।

आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन में संतुलन की आवश्यकता

सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किए गए कई प्रशासनिक व विधिक आदेशों में पहले से ही ऐसे समृद्ध और संपन्न वर्गों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का प्रावधान (Creamy Layer Exclusion) किया गया है, लेकिन अब उन विधिक आदेशों को ही अदालतों में चुनौती दी जा रही है।

अदालत ने 'आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों' (EWS) और पारंपरिक वंचित समूहों के बीच अंतर को समझाते हुए कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर श्रेणियों में सामाजिक पिछड़ापन नहीं, बल्कि केवल वित्तीय पिछड़ापन होता है। अतः आरक्षण के मूल सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए इसमें एक न्यायसंगत विधिक संतुलन होना अनिवार्य है।

जनवरी 2025 का संदर्भ और 7 जजों की संविधान पीठ का विधिक सच

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने आरक्षण के भीतर क्रीमी लेयर की विधिक बहस को दोबारा गरमा दिया है। इससे पहले जनवरी 2025 में, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मध्य प्रदेश के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों के बच्चों को अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित लाभों से बाहर रखने की मांग वाली एक याचिका आई थी, जिसे शीर्ष अदालत ने सुनने से इनकार कर दिया था।

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अदालत ने तब ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया था कि:

  • दविंदर सिंह ऐतिहासिक मामला: अगस्त 2024 में 'स्टेट बैंक बनाम दविंदर सिंह' के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ (7-Judge Constitution Bench) ने एससी-एसटी कोटे से क्रीमी लेयर को बाहर रखने की वकालत जरूर की थी।
  • विधायिका का विधिक क्षेत्राधिकार: परंतु, सात जजों की उस पीठ द्वारा की गई वह टिप्पणी केवल एक विधिक राय (Obiter Dicta) थी। एससी और एसटी समुदायों के भीतर क्रीमी लेयर लागू करने या न करने के संबंध में कोई भी अंतिम विधिक निर्णय लेने का वास्तविक अधिकार देश की विधायिका (संसद और राज्य विधानसभाओं) के पास सुरक्षित है।