डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। रूस से कच्चा तेल आयात कर भारत को होने वाले फायदे को लेकर मीडिया में लंबे समय से चर्चा होती रही है, लेकिन ब्रोकरेज फर्म सीएलएसए की नई रिपोर्ट ने इन दावों को चुनौती दी है। रिपोर्ट के अनुसार, रियायती दरों पर रूस से तेल आयात करने से भारत को प्रति वर्ष केवल 2.5 अरब डॉलर का शुद्ध लाभ हो रहा है, जबकि पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि यह लाभ 10 से 25 अरब डॉलर तक होगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि भारत रूसी तेल खरीदना बंद करता है तो उसे अन्य सीमित विकल्पों पर निर्भर होना पड़ेगा। इससे वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। यानी, भारत के लिए रूसी तेल का महत्व केवल छूट तक सीमित नहीं, बल्कि आपूर्ति की स्थिरता से भी जुड़ा है।
सीएलएसए ने स्पष्ट किया कि रूसी कच्चे तेल की वास्तविक छूट उतनी बड़ी नहीं है जितनी दिखती है। इसका कारण है शिपिंग, बीमा और पुनर्बीमा से जुड़े प्रतिबंध। भारतीय कंपनियां लागत, बीमा और माल ढुलाई (CIF) के आधार पर तेल खरीदती हैं, जिससे छूट का असर काफी कम हो जाता है।
वित्त वर्ष 2024 में औसतन छूट लगभग 8.5 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन वित्त वर्ष 2025 में यह घटकर 3–5 डॉलर रह गई। हाल ही में यह और कम होकर केवल 1.5 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है।
यूक्रेन युद्ध से पहले भारत रूस से केवल 1% कच्चा तेल आयात करता था। युद्ध के बाद रूस ने पश्चिमी देशों की घटती खरीद के बीच भारत को बड़ी छूट दी, जिससे भारत का आयात हिस्सा बढ़कर 40% तक पहुंच गया। वर्तमान में भारत की कुल जरूरत का 36% तेल रूस से आता है।
भारत के अन्य प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में इराक (20%), सऊदी अरब (14%), संयुक्त अरब अमीरात (9%) और अमेरिका (4%) शामिल हैं।
सीएलएसए का निष्कर्ष साफ है - रूसी तेल से भारत को होने वाला वास्तविक लाभ मीडिया रिपोर्टों की तुलना में कहीं कम है, और अब छूट घटने से यह अंतर और भी कम होता जा रहा है।
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