
डिजिटल डेस्क, नागपुर। नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी उत्सव के दौरान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए समाज में आत्मबोध और एकता की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता में एकता का आधार सनातन दर्शन और 'स्व' का बोध है। जब तक समाज अपनी साझा राष्ट्रीय पहचान और अपनत्व के भाव को सर्वोपरि रखेगा, तब तक देश सशक्त, संगठित और आत्मनिर्भर बना रहेगा।
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उन्होंने संत शिरोमणि रविदास, स्वामी श्रद्धानंद और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जैसे पूज्य संतों व महापुरुषों के योगदान का स्मरण करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी संतों ने स्वधर्म, भक्ति और सामाजिक समरसता की अलख जगाकर समाज को एकजुट रखा। यह समय धर्म और समाज की रक्षा में बलिदान देने वाले अन्य महापुरुषों के स्मरण का भी है।
आर्य समाज के प्रखर संन्यासी, शिक्षाविद और स्वतंत्रता सेनानी स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान के 100 वर्ष पूरे हुए हैं। वहीं, ओडिशा में वनवासी बंधुओं की सेवा और धर्म रक्षा के लिए जीवन समर्पित करने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी की जन्म शताब्दी चल रही है। समाज को संगठित करने और 'स्वदेशी मेलों' के जरिए स्वाभिमान जगाने वाले राजनारायण बसु का भी यह 200वां वर्ष है। इन सभी विभूतियों का स्मरण इसलिए आवश्यक है क्योंकि संघ पिछले 100 वर्षों से समाज में इसी आत्मबोध और 'स्व' की भावना को जगाने का कार्य कर रहा है।
मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि भारत की विविधता में एकता का आधार सनातन दर्शन और स्व का बोध है। यही संस्कार एक व्यक्ति को निस्वार्थ भाव से देश और समाज के लिए बलिदान देने की प्रेरणा देता है। कैप्टन स्मित मच्छर जैसे वीरों का बलिदान इसी परंपरा का प्रतीक है। जब समाज अपने संस्कारों से जुड़ा रहता है तो उसमें कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति का भाव स्वतः जागृत होता है।
उन्होंने कहा कि संत शिरोमणि रविदास, स्वामी श्रद्धानंद और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जैसे महापुरुषों ने भी इसी संस्कार की अलख जगाई। स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान के 100 वर्ष और स्वामी लक्ष्मणानंद की जन्म शताब्दी इस बात का प्रमाण है कि सनातन परंपरा त्याग और सेवा से ही जीवित है।
सरसंघचालक ने अपने संबोधन में जिन 'पंच परिवर्तन' का जिक्र किया, उसमें सबसे प्रमुख आधार 'स्वबोध' और 'स्वदेशी' का आचरण ही है। हमारे संविधान की प्रस्तावना में लिखा गया 'हम भारत के लोग' वास्तव में उसी आत्मबोध और भावनात्मक एकता का प्रतीक है। यही वह आंतरिक सूत्र है, जिसने प्राचीन काल से तमाम विविधताओं के बावजूद भारत को एक देश, एक समाज और एक राष्ट्र के रूप में जोड़े रखा है। हमारे पूर्वजों ने संपूर्ण सृष्टि की एकता को अनुभव किया था और उसी के आधार पर समाज में परस्पर अपनेपन का व्यवहार स्थापित किया था।
उन्होंने कहा कि जब समाज इस एकता और अपनेपन के दर्शन को भूल गया, तब हम आपस में बंट गए और कमजोर होते चले गए। इसी फूट के कारण देश को सदियों की गुलामी झेलनी पड़ी। अनगिनत बलिदानों और संघर्षों के बाद मिली स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि हम अपने उस भावनात्मक रिश्ते को फिर से समझें और जीवन में उतारें, जिसका निर्देश हमारे संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में भी निहित है। आज की परिस्थितियों में देश को संगठित और सक्षम बनाने के लिए स्वतंत्रता संग्राम के दौर से भी अधिक तपस्या, समर्पण और सजगता की आवश्यकता है।
भारत प्राकृतिक बनावट, पंथ, प्रांत, जाति, भाषा, खानपान और रीति-रिवाजों से भरी विशाल विविधता का देश है। इस विविधता को साथ लेकर आगे बढ़ने के लिए एक ऐसे व्यापक आधार की जरूरत है, जो सबको स्वीकार करे, सम्मान दे और सभी की सुरक्षा व मान-मर्यादा सुनिश्चित करे। दुनिया की अन्य विचारधाराओं में ऐसा समावेशी दृष्टिकोण दुर्लभ है, लेकिन भारत की सनातन परंपरा में यह सत्य अनादि काल से रचा-बसा है। यह कोई कोरी कल्पना या केवल किताबों में लिखी बात नहीं है, बल्कि हमारे संतों और महापुरुषों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभूत सत्य है।
हमारी परंपरा सिखाती है कि सृष्टि में विविधता स्वाभाविक और परिवर्तनशील है, जबकि संपूर्ण अस्तित्व के भीतर समाई एकता अटल और शाश्वत है। मनुष्य जीवन का अंतिम ध्येय इसी एकता को पहचानकर संयम, त्याग और 'वसुधैव कुटुंबकम' के भाव से जीना है, जिससे स्थायी सुख मिलता है। यही ज्ञान हमें वेदों, उपनिषदों, मंदिरों, मठों और गुरुद्वारों की शिक्षाओं में मिलता है। हमारा सनातन दृष्टिकोण यह भी सिखाता है कि बदलते समय के साथ जीवनशैली में जरूरी बदलाव अपनाए जाएं, लेकिन शाश्वत जीवन मूल्यों को हमेशा अडिग रखा जाए।
अपनी भाषा, जाति या पंथ के प्रति स्वाभाविक लगाव होना गलत नहीं है, लेकिन जब तक इन सभी पहचानों से ऊपर देश और साझी राष्ट्रीयता का भाव सबसे ऊपर रहा, तब तक भारत पूरे विश्व के लिए एक आदर्श राष्ट्र बना रहा। इतिहास साक्षी है कि जब भी हम इस व्यापक राष्ट्रीय भाव को भूले, हमारे बीच का अपनत्व खत्म हुआ, हम विभाजित और कमजोर हुए तथा भय और असुरक्षा से घिर गए। इसलिए आज समय की मांग है कि हम संकीर्ण दायरों से ऊपर उठकर इस साझी एकता को फिर से अपने आचरण में लाएं।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य दुर्बल होता है, तो वह संकीर्ण होकर स्वयं को सीमाओं में बांध लेता है। कृण्वन्तो विश्वमार्यम् यानी संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाने का उद्घोष करने वाले हम स्वयं बंधनों में उलझ गए और अहंकारी बनकर अपने पतन का कारण बने। अपने आचरण को त्यागने से हमारी दुर्गति हुई। अब समय आ गया है कि हम अपनी पहचान और गौरव को पुनः पहचानें। पिछले 100 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज में इसी आत्मबोध को जगाने और राष्ट्र को संगठित करने के कार्य में जुटा है।
शताब्दी वर्ष के दौरान व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया गया। संघ के स्वयंसेवक देश के 4.61 लाख से अधिक गांवों, 41 हजार बस्तियों और करीब 10.19 करोड़ परिवारों तक पहुंचे। इसके अलावा 1,117 जिलों में प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठियां, 5,036 खंडों में सामाजिक सद्भावना बैठकें, 34 हजार से अधिक मंडलों में हिंदू सम्मेलन और युवा सम्मेलन आयोजित किए गए। विश्व भर में भारत, हिंदू दर्शन और संघ के प्रति जिज्ञासा बढ़ रही है। जड़वाद और बेलगाम उपभोग से जूझती दुनिया आज पर्यावरण संकट, पारिवारिक विघटन और भू-राजनीतिक तनावों के समाधान के लिए भारतीय जीवन दृष्टि की ओर देख रही है।
पंच परिवर्तन केवल एक साल का अभियान नहीं, बल्कि जीवनशैली में निरंतर उतारने वाली आदत है। आज तकनीक और सोशल मीडिया के विस्तार से हर तरह की जानकारी सुलभ है, लेकिन सही और गलत का अंतर समझने के लिए विवेक आवश्यक है। विवेक के अभाव में युवा पीढ़ी नशे और भटकाव जैसी घातक समस्याओं की ओर बढ़ सकती है। इसलिए समाज, शासन और विशेष रूप से अभिभावकों को नई पीढ़ी में उचित-अनुचित को परखने का संस्कार डालना होगा ताकि वे देश के नेतृत्व के लिए तैयार हो सकें।
केवल अंधाधुंध भौतिक प्रगति मनुष्य और प्रकृति दोनों के लिए विनाशकारी सिद्ध हो रही है। हिमालयी क्षेत्र और नेपाल की हालिया प्राकृतिक त्रासदियां इसी असंतुलित विकास का परिणाम हैं। अर्थव्यवस्था के साथ-साथ पर्यावरण और नैतिकता का संतुलन जरूरी है। यदि तकनीक और एआई का उपयोग नैतिक अनुशासन के बिना हुआ, तो यह महाविनाश का कारण बन सकता है। भारत का प्राचीन सनातन विचार पूरे विश्व को परिवार मानता है और विकास का एक स्थायी, संतुलित व एकात्म मॉडल प्रस्तुत करता है।
हिंदू दृष्टि किसी विशिष्ट पूजा पद्धति, भाषा या खानपान का बंधन नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिकता, विश्व बंधुत्व और मानवता की साझी जीवन दृष्टि है। भारत के प्रति हमारी निष्ठा बिना किसी शर्त और स्वार्थ के होनी चाहिए। तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें। एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए आत्मिक भाव के साथ-साथ सामर्थ्य और बल का होना भी अनिवार्य है, क्योंकि शक्तिहीन समाज न तो अपनी रक्षा कर सकता है और न ही सम्मान पा सकता है। संघ इसी एकात्म और बलशाली समाज के निर्माण के लिए समर्पित है।
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आरएसएस के विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि संगठित व बल संपन्न हिन्दू समाज की बात करना या उसके लिए कार्य करना सर्व पंथ समादर की भावना अथवा राष्ट्र की भावनिक एकात्मकता के विरुद्ध नहीं है। हिन्दू समाज का विचार व स्वभाव समावेशक होने के नाते संघ कार्य हम सबकी भावनिक एकात्मता, सद्भावना व सदाचार का पोषक ही होगा। पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता रहा यह स्वभाव व संस्कार ही कैप्टन स्मित मच्छर को अपनी प्राणों की बाजी लगाकर मनुष्यों के संरक्षण के लिए स्वयं को झोंक देने की प्रेरणा देता है।