
डिजिटल डेस्क। गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) के सुदूर जनजातीय अंचल से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जो आधुनिक भारत के बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवालिया निशान लगाती है। एक 24 वर्षीय गर्भवती महिला को प्रसव के लिए जंगलों के बीच 6 किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ा, जिसकी कीमत उसे और उसके अजन्मे बच्चे को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
गढ़चिरौली के एटापल्ली तालुका स्थित आलदंडी टोला निवासी आशा संतोष किरंगा नौ महीने की गर्भवती थी। उसका गांव मुख्य सड़क से पूरी तरह कटा हुआ है और वहां प्रसव की कोई भी चिकित्सा सुविधा मौजूद नहीं है। 1 जनवरी को जब प्रसव का समय करीब आया, तो समय पर मदद पाने की उम्मीद में आशा ने अपने पति के साथ जंगल के दुर्गम रास्तों से पैदल चलने का फैसला किया।
वह अपनी बहन के घर 'पेठा' पहुंचने के लिए 6 किलोमीटर पैदल चली। गर्भावस्था के अंतिम चरण में शरीर पर पड़े इस अत्यधिक दबाव ने उसके स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया।
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अधिकारियों के अनुसार, 2 जनवरी की सुबह आशा को तेज प्रसव पीड़ा (लेबर पेन) शुरू हुई। उसे एम्बुलेंस के जरिए हेदरी के काली अम्माल अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्काल सिजेरियन ऑपरेशन का निर्णय लिया, लेकिन अफसोस कि तब तक काफी देर हो चुकी थी।
गढ़चिरौली के जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. प्रताप शिंदे ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि महिला का पंजीकरण आशा वर्कर्स के पास था। उन्होंने स्वीकार किया कि प्रसव के ऐन वक्त पर इतनी लंबी पैदल यात्रा ने ही जटिलताएं पैदा की होंगी। तालुका स्वास्थ्य अधिकारी से इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है और जांच के आदेश दिए गए हैं।