
मुस्लेमीन, रामपुर। रामपुर की पहचान आज भी ‘नवाबों के शहर’ से होती है। करीब 175 साल तक रामपुर रियासत पर नवाबों ने शासन किया। नवाबी खानदान ने राजनीति में अपनी धाक जमाई। लंबे समय तक नवाब परिवार का कोई न कोई सदस्य लोकसभा और विधानसभा में प्रतिनिधित्व करता हैं, लेकिन वक्त बदलते समय नहीं लगता। नवाब खानदान के वक्त ने भी पलटी मारी। पहले नवाब खानदान का महल, जिसे नूरमहल के नाम से जाना जाता है, वहां से टिकट तय किए जाते थे, लेकिन आज खुद उन्हें ही टिकट मिलना मुश्किल हो गया है।
1947 में देश के आजाद होने के दो साल साल 1949 में नवाब खानदान ने राजनीति में प्रवेश किया तो रामपुर में खूब जश्न मनाया गया था। यहां से 2 बार नवाब खानदान के रिश्तेदार राजा सैयद मेहंदी सांसद बने और इसके बाद नवाब जुल्फिकार अली खां उर्फ मिक्की मियां 5 बार सांसद रहे। इसके बाद मिक्की मियां की पत्नी बेगम नूरबानो 2 बार सांसद चुनी गई। मिक्की मियां के परिवार की बात करें तो बाद में उनके बेटे नवाब काजिम अली खां उर्फ नवेद मियां 5 बार विधायक रहे और प्रदेश सरकार में मंत्री भी बने।
देश की आजादी के बाद रामपुर का नूरमहल कांग्रेस का राजनीति का केंद्र हुआ करता था। पश्चिम उत्तर प्रदेश के प्रत्याशियों के चयन में नूरमहल की खास भूमिका होती थी। यहां तक की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, एचडी देवगौड़ा और मनमोहन सिंह भी नूरमहल आ चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी यहां एक रात के लिए रुक भी चुकी है।
रामपुर की सियासत में खास स्थान रखने वाले पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष चंद्रपाल सिंह के नूरमहल से बहुत करीबी संबंध रहे हैं। उनका मानना है कि बीते कुछ सालों में नवाब खानदान की सियासी कमजोरी के लिए खुद नूरमहल के लोग ही जिम्मेदार हैं। 2003 में नूर बानो कांग्रेस की सांसद थीं और उनके बेटे नवेद मियां विधायक। उस दौरान नवेद मियां कांग्रेस छोड़ बसपा में शामिल हो गए थे। इसके 6 माह बाद ही समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे।
इसके बाद फिर बसपा में शामिल होकर कांग्रेस में आ गए। 2022 में नवेद मियां रामपुर शहर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे, उनके बेटे हमजा मियां स्वार सीट पर भाजपा गठबंधन के अपना दल से मैदान में थे। नूरमहल के लोग खुद कई पार्टियों का झंडा लेकर चल निकले तो वफादार लोग अलग होते गए।
पूर्व सांसद बेगम नूरबानो का कहना है कि बीते कुछ सालों में राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। हम हमेशा कांग्रेस के साथ रहे और उसी से ही चुनाव लड़ने की बात कही थी। सपा और कांग्रेस के गठबंधन के चलते रामपुर सीट समाजवादी पार्टी के पास चली गई। पार्टी हाईकमान जैसा चाहा, हमने हमेशा वैसा ही किया। कांग्रेस के साथ-साथ समाज की बेहतरी के लिए हमसे जो भी हो सकेगा, वह लगातार वह काम करते रहेंगे।