Republic Day 2020: 09 अगस्त 1925 को काकोरी स्टेशन के पास सहरानपुर-लखनऊ पैसेंजर से पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में सरकारी खजाना लूटा गया था। इस 'एक्शन' में एक क्रांतिवीर ऐसे भी शामिल थे, जिनका नाम आज बहुत ही कम लोग जानते हैं। वे थे शचीन्द्रनाथ बक्शी। शचीन्द्रनाथ बक्शी ने काकोरी स्टेशन से दूसरे दर्जे के तीन टिकट खरीदे थे। टिकट बाबू ने उन्हें आश्चर्य से देखा था, क्योंकि कई महीनों बाद किसी ने दूसरे दर्जे (सेकंड क्लास) के टिकट खरीदे थे। काकोरी स्टेशन से शचीन्द्रनाथ बक्शी के साथ अशफाक उल्ला खां और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी भी बैठे।

ट्रेन काकोरी स्टेशन से जैसे ही आगे बढ़ी, शचीन्द्रनाथ ने ट्रेन की जंजीर खींचकर उसे रोक दिया। सभी क्रांतिकारी तुरंत गाड़ी से नीचे उतरे और लगातार हवाई फायर करते रहे, ताकि ट्रेन में सवार लोग खिड़कियां और दरवाजे बंद करके अंदर ही बैठे रहें और उन्हें पहचान न पाएं। रेल का गार्ड जगन्नाथ प्रसाद नीचे उतरकर देखने आ रहा था कि किसने जंजीर खींची, लेकिन शचीन्द्रनाथ ने उसके सामने पिस्तौल तानकर नीचे घास पर लेटने को कहा और बोले- 'हम क्रांतिकारी हैं, डकैत नहीं। हम क्रांति के लिए सरकारी खजाना लूटने आए हैं, किसी को मारने नहीं।'

शचीन्द्रनाथ ने गार्ड को धौंस देते हुए यह भी कहा कि भविष्य में हमें पहचानोगे तो नहीं? गार्ड जगन्नाथ प्रसाद मन ही मन क्रांतिकारियों का समर्थक था, इसलिए उसने संकल्पपूर्वक कहा कि वह मृत्युपर्यंत क्रांतिकारियों के बारे में किसी को कुछ नहीं बताएगा। बाद में जब शचीन्द्रनाथ पकड़े गए तो गार्ड ने अपना संकल्प पूरा किया।

उसने शिनाख्त परेड में शचीन्द्रनाथ को पहचाना ही नहीं। यह क्रम तीन बार हुआ,लेकिन गार्ड जगन्नाथ प्रसाद ने अपना मुंह नहीं खोला। हालांकि बाद में काकोरी केस में उन्हें सजा हुई व अंडमान भेजा गया। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने गरीबी में जीवन गुजारा। तत्कालीन कांग्रेस सरकार की आपाधापी और भ्रष्टाचार को देखते हुए उन्होंने जनसंघ से चुनाव भी लड़ा और उत्तरप्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए। 23 नवम्बर 1984 को वे ब्रह्मलीन हो गए।

Posted By: Arvind Dubey