डिजिटल डेस्क। मां ने न जाने कितनी बार अपना निवाला छोड़ा होगा, ताकि बच्चे का पेट भर सके। पिता ने धूप-बारिश की परवाह किए बिना पसीना बहाया, ताकि बेटा-बेटी की पढ़ाई अधूरी न रह जाए। जिंदगी भर उन्होंने बस एक ही सपना देखा, बच्चा खुश रहे, आगे बढ़े। लेकिन वक्त के साथ तस्वीर बदल जाती है।
वहीं बच्चे, जिनके लिए मां-बाप ने अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया, नौकरी लगते ही और शादी होते ही…मां-बाप को अक्सर अकेला छोड़़ देते हैं। माता-पिता बेटा होने के बावजूद उपेक्षित, असहाय और चुपचाप जीवन जीने लगते हैं।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने लिया फैसला
इसी दर्द को महसूस करते हुए तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने एक ऐसा फैसला लेने की बात कही है, जो सिर्फ कानून नहीं, बल्कि एक संवेदनशील संदेश है। एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा, जब मैंने ग्रुप-1 और ग्रुप-2 के चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र दिए, तो मैंने साफ कहा था कि इनमें से 90 प्रतिशत गरीब परिवारों से आते हैं।
अगर ये लोग शादी के बाद अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करेंगे, तो उनके वेतन से 10 से 15 प्रतिशत राशि काटी जाएगी और वह पैसा सीधे उनके माता-पिता तक पहुंचेगा। इसके लिए कानून बनाया जाएगा। यह फैसला उन मां-बाप के लिए है, जो चुपचाप अपमान सह लेते हैं, लेकिन बच्चों से कुछ मांगते नहीं।
अपने ही बच्चों के लिए बोझ बन जाते हैं
मुख्यमंत्री ने भावुक होते हुए कहा, माता-पिता दिन और रात मेहनत करते हैं। खुद भूखे रह जाते हैं, लेकिन बच्चों को कभी कमी महसूस नहीं होने देते। एक-एक पैसा जोड़कर उन्हें पढ़ाते हैं, घर-जमीन बनाते हैं। लेकिन जब वही माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं, तो कई बार अपने ही बच्चों के लिए बोझ बन जाते हैं।
सरकार लेकर आई है ‘प्रणाम योजना’
ऐसे ही बेसहारा माता-पिता के लिए सरकार लेकर आई है ‘प्रणाम योजना’। इस योजना के तहत उपेक्षित माता-पिता को डे-केयर सेंटर में रखा जाएगा, जहां उन्हें इलाज, भोजन, सम्मान और अपनापन मिलेगा। मुख्यमंत्री के शब्दों में, अगर बच्चे साथ नहीं देते, तो सरकार उनके लिए परिवार बनेगी।
दिव्यांगजनों के लिए 50 करोड़ का प्रावधान
सरकार की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, ‘प्रणाम योजना’ के तहत दिव्यांगजनों के लिए 50 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। उन्हें आवश्यक उपकरण दिए जाएंगे, आत्मविश्वास बढ़ाया जाएगा और शिक्षा-रोजगार में सहयोग मिलेगा। जिन दंपतियों में दोनों पति-पत्नी दिव्यांग हैं, उन्हें दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता भी दी जाएगी।
समाज को आईना दिखाने की कोशिश
यह सिर्फ वेतन कटौती का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि यह समाज को आईना दिखाने की कोशिश है। क्योंकि जिस दिन मां-बाप की कद्र कानून से करवानी पड़े, उस दिन हमें खुद से पूछना होगा कि क्या हम सच में इंसान कहलाने लायक रह गए हैं?