पद्मश्री से सम्मानित लेखक, कथाकार, नाटककार और आलोचक गिरिराज किशोर का निधन
गिरिराज किशोर ने कालजयी रचना पहला गिरमिटिया लिखी थी, जो महात्मा गांधी के अफ्रीका प्रवास पर आधारित था। ...और पढ़ें
By Shashank Shekhar BajpaiEdited By: Shashank Shekhar Bajpai
Publish Date: Sun, 09 Feb 2020 11:38:30 AM (IST)Updated Date: Mon, 10 Feb 2020 09:53:55 AM (IST)

कानपुर। पद्मश्री से सम्मानित लेखक गिरिराज किशोर का 83 वर्ष की आयु में रविवार सुबह उनके घर पर निधन हो गया। हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासकार होने के साथ एक कथाकार, नाटककार और आलोचक रहे गिरिराज किशोर ने कालजयी रचना पहला गिरमिटिया लिखी थी, जो महात्मा गांधी के अफ्रीका प्रवास पर आधारित था। उनके निधन से साहित्य के क्षेत्र में शोक है।
कानपुर के सूटरगंज में रहने वाले गिरिराज किशोर के सम-सामयिक विषयों पर विचारोत्तेजक निबंध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं। साल 1991 में प्रकाशित उनका उपन्यास ढाई घर भी बहुत लोकप्रिय हुआ उसे 1992 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।
बताते चलें कि साहित्यकार गिरिराज किशोर का जन्म आठ जुलाई 1937 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुआ था। वह IIT कानपुर में 1975 से 1983 तक कुलसचिव भी रहे। आईआईटी कानपुर में साल 1983 से 1997 के बीच उन्होंने रचनात्मक लेखन केंद्र की स्थापना की और उसके अध्यक्ष रहे। नौकरी के दौरान भी इस साहित्यकार ने अपने लेखन के कार्य को नहीं छोड़ा। महात्मा गांधी पर रिसर्च जारी रखी।
जमींदारी छोड़कर साहित्य में कमाया नाम
गिरिराज किशोर जी के बादा जमींदार थे। मगर, उनको वह पसंद नहीं थी और इसलिए मुजफ्फरनगर के एसडी कॉलेज से स्नातक करने के बाद वह घर से 75 रुपए लेकर इलाहाबाद आ गए। इसके बाद फ्री लांसिंग के तौर पर पेपर व मैगजीन के लिए लेख लिखने लगे और उससे मिलने वाली राशि से खर्च चलते थे।
इलाहाबाद में साल 1960 में एमएसडब्ल्यू पूरा कर अस्सिस्टेंट एम्प्लॉयमेंट ऑफिसर बने और आगरा के समाज विज्ञान संस्थान से उन्होंने 1960 में मास्टर ऑफ सोशल वर्क की डिग्री ली। वह उत्तर प्रदेश में 1960 से 1964 तक सेवायोजन अधिकारी व प्रोबेशन अधिकारी भी रहे। इसके बाद अगले दो वर्ष प्रयागराज में स्वतंत्र लेखन किया। जुलाई 1966 से 1975 तक वह तत्कालीन कानपुर विश्वविद्यालय में सहायक और उपकुल सचिव रहे।