होशंगाबाद(ब्यूरो)। देश के पूर्वी तट स्थित समुद्री क्षेत्र पाराद्वीप में बुधवार रात आए भूकंप से जितनी तीव्रता से प्रदेश और जिले की धरती नहीं थर्राई उससे कहीं ज्यादा भूगर्भ शास्त्रियों के दिमाग थर्रा उठे हैं। उनकी माथे पर एक बार फिर चिंता की लकीरें आ गईं हैं। ज्ञात रहे कि होशंगाबाद जिला भूकंप की दृष्टि से बेहद संवेदनशील जोन में आता है।
चिंता का एक बड़ा कारण यह है कि उक्त भूकंप इंडियन प्लेट के टूटने का परिणाम बताया जाता है। ठीक इसी प्रकार नर्मदा की भ्रंश घाटी में भी भूगर्भ में एक दरार है, जो लगातार सरक रही है। भूगर्भ शास्त्री पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि घाटी की यह दरार लगातार चौड़ी होती जा रही है। ऐसी स्थिति में यहां की धरती कभी भी कांप सकती हैं। पाराद्वीप में आए भूकंप के बाद भूगोलवेत्ता नए सिर से अध्ययन में जुट गए हैं।
इस संबंध में भूगर्भ शास्त्री डॉ आईबी अवस्थी ने बताया कि हालांकि भूकंप आने की कोई भविष्यवाणी या अनुमान नहीं लगाया जा सकता, लेकिन भूगर्भ में लगातार होने वाली हलचलों से जाहिर है कि यहां कभी हलचल हो सकती है। यह क्षेत्र वास्तव में भ्रंश क्षेत्र है। यही कारण है कि नर्मदा का प्रवाह देश की अन्य नदियों के प्रवाह के विपरीत है। इसका अधिकांश प्रवाह क्षेत्र डैक्कन ट्रेप क्षेत्र में है। नर्मदाघाटी में अनेक स्थानों पर लावा का लम्बवत जमाव भी पाया गया है। इससे साफ जाहिर है कि यह क्षेत्र पूर्व में ज्वालामुखी घटना का केंद्र रहा होगा।
लगातार चटक रही चट्टानें
डॉ अवस्थी का कहना है कि नर्मदा घाटी में ऊपरी परत कंकरीली है। इसके बाद रवेदार परतें हैं। फिर कठोर चट्टानें और इसके नीचे जल्द टूटने वाली चट्टानें हैं। भू-संरचना देखने से कहा जा सकता है कि यह क्षेत्र कमजोर दरार का क्षेत्र है। नीचे की कमजोर चट्टानें पूरी भारतीय प्लेट को दो दिशाओं उत्तर और दक्षिण की ओर सरकने के कारण दबाव पैदा हो रहा है। यही कारण है कि यहां अक्सर हलके झटके महसूस होते हैं।
भ्रंश क्षेत्र में बढ़ रहा खतरा
डॉ अवस्थी का दावा है कि भ्रंश क्षेत्र में खतरा लगातार बढ़ रहा है। क्षेत्र में बारिश की मात्रा में साल-दर-साल वृद्घि हो रही है। इसके अलावा क्षेत्र में बने बांधों के कारण दरारों में पानी भर रहा है। इससे चट्टानों का संतुलन प्रभावित होने की आशंका है। हरदा और खंडवा क्षेत्र में कुओं के जलस्तर में अचानक बदलाव आ रहा है। पानी के स्वाद और रंग में परिवर्तन आ रहा है। ऐसे परिवर्तन भूकंप के पहले खनिजों और उससे निकलने वाली गैसों के कारण होते हैं। यह सारी बातें भूगर्भीय उथल-पुथल की ओर इशारा करते हैं।
यहां तो उपकरण तक नहीं
बेहद संवेदनशील जोन होने के बावजूद होशंगाबाद जिले में भूकंप की तीव्रता नापने के लिए रैक्टर स्केल तक नहीं लगा है। भूगर्भीय हलचल होने पर जिले को भोपाल स्थित केंद्र पर निर्भर होना पड़ता है। मौसम विभाग के आरसी गौर ने बताया कि भूकंप की तीव्रता मापने का पैमाना भोपाल में स्थित है।
जागरूकता और प्रबंधन जरूरी
उन्होंने कहा कि न तो भूकंप की भविष्यवाणी की जा सकती है और न ही उसे रोका जा सकता है। इसके लिए लोगों को जागरूक किया जाए। क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा भूकंप रोधी मकानों का निर्माण कराया जाए। इसके साथ ही प्रशासन को आपदा प्रबंधन को मजबूत करना चाहिए।