
मल्टीमीडिया डेस्क। फसल कटने के त्यौहार वैसाखी के दिन अन्नदाता दुखी है। देश के एक बड़े हिस्से में ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश ने फसल को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। देश के मुंह को निवाला देने वाले अन्नदाता के घर में फाका पड़ गया है। इस स्थिति में उन उपायों पर चर्चा हो रही है, जिन्हें अपनाकर किसान समृद्ध हो सकती है।
इस संबंध में Naidunia.com से चर्चा में जैविक खेती के विशेषज्ञ अरुण डीके ने बताया, देश में नकदी फसलों को बढ़ावा देना ही आज किसानों की इस दिनहीन स्थिति का मूल कारण है। उनकी नजर में भारत कभी कृषि प्रधान देश था ही नहीं। शुरू से हम उद्योग प्रधान रहे हैं। हर वह घर छोटा-मोटा उद्योग था, जहां खेतीयोग्य कृषि होती थी।
अमेरिका में जॉर्ज वॉशिंगटन कार्वर ने एक उपज से कई तरह के उद्योग चलाकर बताए थे। मुंगफली से तीन सौ तरह के उत्पाद बनाकर दुनिया के सामने रख दिए थे। ठीक इसी तरह पहले हमारे देश में भी घर-घर में चरखा चलता था। साबून घर में बनते थे। गुड और उससे जुड़ी चीजें बनती थीं। लेकिन आज किसान के घर का चौका-चूल्हा सिर्फ इस बात निर्भर रह गया है कि वह अनाज लेकर बाजार जाएगा, बेचेगा तो ही पैसा मिलगा। फसल बिगड़ गई तो वही नौबत आती है जो अभी है।
एक और बड़ा कारण एकल फसल है। लालच में आकर किसान केवल गेहूं या केवल सोयाबीन या केवल चावल बो रहा है। यह फसल बर्बाद हुई तो समझो सबकुछ बर्बाद। इसके बजाए बहुफसलीय खेती की जाना चाहिए। इससे किसान की आय के साधन बढ़ जाएंगे। इस मामले में द. भारत के किसानों से सीखा जा सकता है। वे मोटे अनाज की खेती करते हैं। एक बार में 15-16 फसलें प्राप्त करते हैं। ज्वार, बाजरा, रागी, कुट्टू के रूप में उन्हें एक्सपोर्ट की जाने सकने वाली उपज प्राप्त होती है।
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सरकार की आधे-अधूरे वैज्ञानिक अनुसंधान को किसानों पर थोप देती है। जैसे कि सोयाबीन के केस में हो रहा है। सोयाबीन की फली में तेल वातावरण से मिलता है, जबकि उसकी खली मिट्टी से बनती है। तेल के साथ-साथ हमने खली भी बेचकर गलत करते हैं। खली वापस मिट्टी में मिला दी जानी चाहिए, ताकि मिट्टी की उर्वरकता बनी रहे। या फिर पशुओं को खिला दी जाए, ताकि गोबर के जरिए पौष्टिक तत्व वापस मिट्टी में मिल सकें, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है।
कुल मिलाकर किसानों को सही-सही जानकारी दी जाए। उन्हें बहुफसलीय खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाए। सही प्रशिक्षण दिया जाए। कृषि उत्पादों से कुटीर उद्योग लगाए जाएं। इससे न केवल किसान के दीवालिया होने का खतरा कम होगा, बल्कि वह समृद्ध भी होता चला जाएगा।
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