हजार साल पुराने इस मंदिर में जल नहीं चढ़ाने की है परंपरा
भेड़ाघाट स्थित 64 योगिनी मंदिर में भगवान गौरीशंकर का मंदिर बीच में स्थित है। इसके चारों तरफ बाउंड्री में 82 योगनियां हैं। ...और पढ़ें
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Publish Date: Mon, 06 Aug 2018 11:28:15 AM (IST)Updated Date: Tue, 07 Aug 2018 07:45:26 AM (IST)

जबलपुर । जबलपुर से करीब 17 किमी दूर पर्यटन क्षेत्र भेड़ाघाट में 64 योगिनी गौरीशंकर मंदिर है। यहां पहुंचने के लिए लोगों को पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता है। हालांकि मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण कराया गया है।
इतिहास -
मंदिर का निर्माण दो चरणों में हुआ था। 955 ईस्वी में कलचुरिकाल के युवराजदेव-महारानी नोहलादेवी ने 64 योगिनी मंदिर का निर्माण कराया था। दूसरे चरण में 1155 ईस्वी के आसपास इसका निर्माण महाराज दयाकरण की पत्नी राजमाता अल्हण देवी ने कराया था। त्रिपुरी शिक्षा का केंद्र रहा है। उस दौर में यह विश्वविद्यालय का अंग था। यहां वृषभ वाहन प्रतिमा है।
वशिष्ठ संहिता के अनुसार भगवान शिव-पार्वती कैलाश पर्वत से विश्व भ्रमण के लिए निकले थे। उस समय भगवान नर्मदा किनारे आए थे। यहां ऋषि सुपर्ण को तपस्या करते देख भगवान ने उनसे कहा कि ऋषि आपको क्या वरदान चाहिए। तब ऋषि सुपर्ण ने कहा कि हम आपकी पूजा करना चाहते हैं। इसके बाद भगवान वहां रुक गए और ऋषि जल-पुष्प लेने नर्मदा तट पर गए, जहां मां नर्मदा ने ऋषि सुपर्ण से कहा कि आप मेरे माता-पिता को रोक लो। इसके बाद ऋषि भगवान का पूजन करने वापस नहीं गए और भगवान शिव उनका इंतजार करते रहे। मंदिर में स्थापित प्रतिमा में भगवान शिव पीछे मुड़कर देख रहे हैं, जिससे प्रतीत होता है कि वह माता पार्वती से कुछ पूछ रहे हो।
64 योगिनी गौरीशंकर मंदिर में स्थापित प्रतिमा पर जल नहीं चढ़ाया जाता। मंदिर के बाहर महंतों द्वारा स्थापित शिवलिंग पर श्रद्धालु जल चढ़ाते हैं और अभिषेक पूजन करते हैं। सावन के महीने में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। पर्यटन क्षेत्र होने के कारण यहां सालभर बाहर से भी लोग आते हैं, लेकिन सावन में यहां पूजन का विशेष महत्व है।
देश के 64 योगिनी मंदिरों में सबसे सुरक्षित -
परिसर में 82 योगिनियां हैं भेड़ाघाट स्थित 64 योगिनी मंदिर में भगवान गौरीशंकर का मंदिर बीच में स्थित है। इसके चारों तरफ बाउंड्री में 82 योगनियां हैं। मुगलकाल में इन मूर्तियों को खंडित कर दिया गया था। हालांकि इसे देश के सभी 64 योगिनी मंदिरों में सबसे सुरक्षित माना जाता है। पुराणिक कथाओं में भी इस मंदिर का उल्लेख है। पहले यह स्थान तंत्र साधना का केंद्र रहा है। यहां सावन माह में दूर-दूर से श्रद्धालु आकर पूजन अर्चन करते हैं। राजकुमार गुप्ता, इतिहासकार