
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में शनि देव का न्याय का देवता बताया गया है। शनि जातक का कर्म के अनुसार शुभ-अशुभ फल देते हैं। अच्छे कर्म करने पर शनि की विशेष कृपा प्राप्त होती है। वहीं, बुरे कर्म करने पर शनि के प्रकोप का सामना करना पड़ता है। यदि किसी व्यक्ति पर शनि की कृपा हो जाए तो उसका भाग्य पलभर में बदल जाता है। लेकिन किसी पर शनिदेव का प्रकोप हो तो उसे बर्बाद होते भी समय नहीं लगता।
जब किसी व्यक्ति पर शनि की साढ़ेसाती, ढैया और अन्य महादशा चल रही होती है तो उसे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तीनों तरह से प्रताड़ना सहनी पड़ती है। अगर आप शनिदेव के प्रकोप से बचना चाहते हैं तो हर शनिवार के दिन दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ जरूर करें। ऐसा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं और साढ़ेसाती, ढैया आदि किसी भी तरह की शनि संबन्धी पीड़ा से मुक्ति देते हैं।
शनि स्त्रोत के रचियता राजा दशरथ हैं। उन्होंने ही इस स्तुति से शनिदेव को प्रसन्न किया था। शनिदेव ने जब राजा दशरथ से खुश होकर वर मांगने के लिए कहा था। तब राजा दशरथ ने शनिदेव से विनती की कि वे देवता, असुर, मनुष्य, पशु-पक्षी किसी को भी पीड़ा न दिया करें। उनकी बात सुनकर शनिदेव बेहद प्रसन्न हुए और कहा कि आज के बाद जो भी इस दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे शनि के प्रकोप से मुक्ति मिल जाएगी।
नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च । नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।1।।
नमो निर्मासदेहाय दिर्घश्मश्रुजटाय च । नमो विशालनेत्रायशुष्काय भयाक्रते ।।2।।
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्ने च वै पुन: । नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्राय ते नम: ।।3।।
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्षाय वैनम: । नमो घोराय रौद्राय भीषणाय करालिने ।।4।।
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुखाय ते नम: । सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्कराऽभयदाय च ।।5।।
अधोद्रष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तकाय ते नम: । नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ।।6।।
तपसा दग्ध देहाय नित्यं योगरताय च । नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ।।7।।
ज्ञानचक्षुष्मते तुभ्यं काश्यपात्मजसूनवे । तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।8।।
देवासुरमनुष्याश्य सिद्धविद्याधरोरगा: । त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति च मूलतः ।।9।।
प्रसादं कुरु मे देव वरार्होऽस्मात्युपात्रत: । मया स्तुत: प्रसन्नास्य: सर्व सौभाग्य दायक: ।।10।।
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