
धर्म डेस्क। जीवन में सफलता पाने के लिए कड़ी मेहनत, शादी और सही दिशा में कोशिशें ज़रूरी हैं। कई बार आपकी लगातार कोशिशों के बावजूद सफलता नहीं मिलती और टैलेंट और मौके होने के बावजूद इंसान आगे नहीं बढ़ पाता। इसकी वजह कोई ऐसी आदत हो सकती है, जो धीरे-धीरे उसकी समझदारी, रिश्तों और फैसला लेने की क्षमता पर असर डालती है।
श्रीमद् भगवद् गीता में भगवान कृष्ण ने ऐसी ही तीन आदतों से दूर रहने की सीख दी है। आइए जानते हैं गीता के इस श्लोक का मतलब और ज़िंदगी में इसकी क्या अहमियत है।
श्रीमद् भगवद् गीता के 16वें चैप्टर के 21वें श्लोक में भगवान कृष्ण काम, क्रोध और लालच को इंसान के पतन का कारण बताते हैं। यह श्लोक हमें अपनी इच्छाओं, भावनाओं और लालच पर कंट्रोल करने की प्रेरणा देता है।
श्लोक:
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
काम: क्रोधस्तथा लोभस्तसमादेत्तरयाम् त्यजेत्।
मतलब: इच्छा, गुस्सा और लालच खुद को खत्म करने के तीन दरवाज़े हैं। इसलिए इंसान को इन तीनों को छोड़ देना चाहिए।
इस श्लोक का मैसेज सिर्फ़ धार्मिक जीवन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हमारे करियर, पैसे से जुड़े फ़ैसलों और पर्सनल रिश्तों पर भी लागू होता है।
श्री कृष्ण कहते हैं कि इच्छाएं रखना गलत नहीं है, क्योंकि यही इंसान को आगे बढ़ने के लिए मोटिवेट करती हैं। यहीं पर इच्छाएं ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाती हैं और इंसान के लिए वो इच्छाएं उसकी कमज़ोरी बनने लगती हैं। ऐसे समय में वह गलत फ़ैसले ले सकता है। इतना ही नहीं, दूसरों से लगातार तुलना करना और सब कुछ तुरंत पाने की चाहत इंसान की नाराज़गी बढ़ा सकती है।

गुस्से में अक्सर इंसान ऐसी बातें कह देता है जिनका उसे बाद में पछतावा होता है। गुस्से में लिए गए फ़ैसलों से काम की जगह पर बहस, रिश्तों में मनमुटाव और ज़रूरी मौके हाथ से निकल सकते हैं।
सबक क्या है? किसी बात से परेशान होने पर तुरंत रिएक्ट करने के बजाय, धीरे-धीरे हालात को समझने की कोशिश करें। शांत मन से लिया गया फैसला अक्सर ज़्यादा समझदारी वाला होता है।
पैसे और कामयाबी की चाहत तो नैचुरल है, लेकिन लालच में इंसान अपनी हदें भूल सकता है। ज़्यादा प्रॉफिट कमाने की जल्दी में रिस्की फैसले लेना या गलत तरीकों का सहारा लेना भविष्य में दिक्कतें खड़ी कर सकता है।
सबक क्या है? अपनी ज़रूरतों और एम्बिशन के बीच बैलेंस बनाएं। कामयाबी के साथ-साथ ईमानदारी और संतोष को भी अहमियत दें।

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श्री कृष्ण के इस श्लोक के ज़रिए गीता सिखाती है कि इंसान अपनी आदतों में पॉजिटिव बदलाव ला सकता है। अपनी इच्छाओं पर समझदारी से कंट्रोल रखें, गुस्से के समय सब्र रखें और लालच के बजाय सही फैसलों को प्रायोरिटी दें, तो और भी बड़ी कामयाबी मिल सकती है।
अगर किसी इंसान में सही समय पर सही फैसला लेने की काबिलियत है, तो गीता का यह श्लोक हमें सिखाता है कि अपनी अंदर की कमजोरियों को पहचानना और उन पर कंट्रोल पाना बेहतर ज़िंदगी की तरफ एक ज़रूरी कदम है।