
धर्म डेस्क। रामायण की सबसे प्रचलित कथा में रावण का वध भगवान श्रीराम के हाथों होता है। लेकिन रामायण की कई परंपराओं में एक और कथा मिलती है, जिसमें हजार सिरों वाले रावण का अंत मां सीता के हाथों होता है। इस कथा का वर्णन मुख्य रूप से अद्भुत रामायण में मिलता है। इसे सहस्रशीर्ष, सहस्रमुख या सहस्रस्कंध रावण की कथा कहा जाता है।
कथा के अनुसार, लंका के राजा दशानन रावण का वध होने के बाद अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ। उसी समय ऋषि-मुनि राम की प्रशंसा करने पहुंचे। वे रावण जैसे महाबली के वध को राम की सबसे बड़ी उपलब्धि बता रहे थे। तब श्रीराम ने बताया कि पुष्कर द्वीप में एक और रावण है, जिसके हजार सिर हैं। उसकी तुलना में दस सिर वाला रावण कुछ भी नहीं था। यही हजार सिरों वाला रावण सहस्रशीर्ष कहलाता है।
इसके बाद श्रीराम सेना लेकर पुष्कर द्वीप पहुंचे। साथ में सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान, सुग्रीव और विभीषण भी थे। भीषण युद्ध हुआ। कथा के अनुसार सहस्रशीर्ष के एक बाण से श्रीराम मूर्छित होकर गिर पड़े। यह देखकर पूरी सेना में हाहाकार मच गया।
राम को मूर्छित देख मां सीता ने अपना उग्र रूप प्रकट किया। उन्होंने भयंकर काली का रूप धारण किया और हाथ में खड्ग लेकर रणभूमि में उतर गईं। कथा में बताया गया है कि देवी के उस रूप का तेज ऐसा था कि देवता भी भयभीत हो गए। मां ने युद्ध में सहस्रशीर्ष का वध कर दिया और उसकी सेना का भी नाश किया।
वध के बाद भी मां का क्रोध शांत नहीं हुआ। तब देवताओं ने उनकी स्तुति की। जब श्रीराम को होश आया, तो उन्होंने रणभूमि में देवी का भयंकर रूप देखा। मान्यता है कि तब राम ने सीता को आदिशक्ति के रूप में पहचाना और उनकी स्तुति की। इसके बाद देवी का स्वरूप शांत हुआ और वे फिर से सीता के सौम्य रूप में लौट आईं।
इस कथा में सीता को केवल सहनशील पत्नी नहीं, बल्कि आदिशक्ति और परम सत्ता के रूप में दिखाया गया है। शाक्त परंपरा में इसे इस बात का प्रमाण माना जाता है कि शक्ति के बिना स्वयं राम भी अधूरे हैं।
यह भी पढ़ें- घर से दूर हैं और अकेले मना रहे हैं दीवाली? पूजा से लेकर सुरक्षा तक इन बातों का रखें ध्यान