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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। राधा-कृष्ण का नाम आते ही मन में एक पवित्र और अनन्य प्रेम का भाव जग उठता है। भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में राधा-कृष्ण का संबंध केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक माना गया है। लेकिन एक सवाल हमेशा श्रद्धालुओं के मन में उत्सुकता पैदा करता है कि क्या राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था? इस विषय पर पौराणिक ग्रंथों, लोक कथाओं और विद्वानों के अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं।
गर्ग संहिता के एक प्रसंग के अनुसार, बालपन में जब भगवान श्रीकृष्ण अपने पिता नंदबाबा के साथ भांडीरवन (मथुरा के समीप) गए थे, तब वहां राधा रानी भी प्रकट हुई थीं। मान्यता है कि उसी पावन वन में स्वयं ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूरे विधि-विधान से राधा और कृष्ण का विवाह संपन्न कराया था।
गौड़ीय वैष्णव परंपरा और कई धार्मिक ग्रंथों में यह माना गया है कि राधा और कृष्ण दो अलग-अलग अस्तित्व नहीं हैं। वे एक ही परम सत्ता के दो रूप हैं। पौराणिक विद्वानों का तर्क है कि विवाह दो अलग-अलग आत्माओं का सामाजिक मिलन होता है, लेकिन जब राधा और कृष्ण स्वयं एक ही आत्मा हैं, तो उनके लिए सांसारिक या लौकिक विवाह की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। उनका प्रेम भौतिक सीमाओं से परे और पूर्णत आध्यात्मिक है।
दूसरी ओर, पौराणिक कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि राधा जी का विवाह रायाण (अयान घोष) से हुआ था। वहीं, श्रीकृष्ण जब द्वारकाधीश बने, तो उनका रुक्मिणी, सत्यभामा सहित अन्य रानियों के साथ राजसी विवाह हुआ, जिसका विस्तृत विवरण श्रीमद्भागवत महापुराण में मिलता है।
दिलचस्प बात यह है कि मुख्य 'श्रीमद्भागवत पुराण' में 'राधा' नाम का सीधा और स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, बल्कि वहां केवल एक 'विशेष गोपी' का वर्णन है। राधा जी के स्वरूप का विस्तृत वर्णन बाद के ग्रंथों जैसे ब्रह्मवैवर्त पुराण, गर्ग संहिता और कवि जयदेव की 'गीत गोविंद' में प्रमुखता से मिलता है। इसी कारण शोधकर्ताओं और विद्वानों के बीच इनके ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं।
सामाजिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से भले ही कुछ लोग इसे केवल प्रेम की एक गाथा मानते हों, लेकिन संत-महात्माओं और वैष्णव संप्रदाय का मानना है कि राधा-कृष्ण का संबंध सांसारिक मापदंडों और सामाजिक मर्यादाओं से कहीं ऊपर है। यही वजह है कि युगों-युगों से रुक्मिणी से पहले राधा का नाम लिया जाता है और 'राधे-कृष्ण' का यह नाम भक्ति का सबसे बड़ा आधार बना हुआ है।
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