कान्हा से कितनी बड़ी थीं राधा रानी? जानिए क्यों जन्म के बाद महीने भर बंद रखीं आंखें, पहली बार किसे देखकर खोले नेत्र
मथुरा-वृंदावन में राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़े कई गूढ़ रहस्य हैं। पौराणिक कथाओं और ग्रंथों के अनुसार राधा रानी भगवान श्रीकृष्ण से साढ़े 11 महीने बड़ी...और पढ़ें
By Akriti KumariEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Fri, 18 Sep 2026 10:46:08 AM (IST)Updated Date: Fri, 18 Sep 2026 10:46:08 AM (IST)
मथुरा के रावल गांव में स्थित राधा रानी का प्राचीन मंदिर जहां लाडली जी ने पहली बार खोले थे अपने नेत्र। (फाइल फोटो)HighLights
- राधा रानी अपने प्रिय श्रीकृष्ण से उम्र में करीब साढ़े 11 महीने बड़ी थीं
- राधा जी का जन्म बरसाने के बजाय मथुरा के रावल गांव में हुआ था
- राधा रानी ने अपनी आंखें नहीं खोली जब तक उन्हें कान्हा नहीं दिखे
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। मथुरा-वृंदावन की पावन भूमि पर भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी की दिव्य लीलाएं युगों-युगों से श्रद्धालुओं के दिलों में बसी हैं। गर्ग संहिता, ब्रज परमानंद सागर और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, राधा रानी के प्राकट्य और उनके बाल रूप से जुड़ी कई ऐसी अद्भुत कथाएं हैं, जो आज भी भक्तों को भावविभोर कर देती हैं।
श्री कृष्ण से कितनी बड़ी थीं राधा रानी?
पौराणिक मान्यताओं और ब्रज के विद्वानों के अनुसार, राधा रानी अपने कन्हैया से लगभग 11.5 (साढ़े ग्यारह) महीने बड़ी थीं। राधा रानी का प्राकट्य स्थल बरसाना नहीं, बल्कि रावल गांव माना जाता है। राजा वृषभानु जब यमुना नदी में स्नान कर रहे थे, तब उन्हें एक दिव्य कमल पुष्प पर बाल रूप में राधा रानी प्राप्त हुई थीं।
राधा रानी ने पहली बार कृष्ण को देखकर ही क्यों खोली आंखें?
- जन्म के समय राधा रानी ने अपने नेत्र (आंखें) नहीं खोले थे। उनके माता-पिता (राजा वृषभानु और माता कीर्ति) को लगा कि उनकी लाडली देख नहीं सकतीं।
- जब रावल से लगभग 8 किलोमीटर दूर गोकुल में भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ, तो नंद उत्सव की बधाई देने राजा वृषभानु अपने परिवार के साथ गए।
- गोकुल में बाल राधा घुटनों के बल चलते हुए श्याम सुंदर के पालने के पास पहुंचीं। जैसे ही उन्होंने बाल कृष्ण का स्पर्श किया और उन्हें देखा, तुरंत अपने नेत्र खोल लिए। आध्यात्मिक रूप से माना जाता है कि राधा जी अपने प्राकट्य के बाद इस सृष्टि में सबसे पहले केवल अपने आराध्य श्री कृष्ण का ही दर्शन करना चाहती थीं।
रावल गांव का 5250 साल पुराना दिव्य चमत्कारिक पेड़
रावल गांव स्थित मंदिर परिसर की छत और गुंबद पर एक अत्यंत चमत्कारिक वृक्ष स्थित है, जो श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। मंदिर की गुंबद पर उगा यह पेड़ पिछले 5250 साल से बिना किसी स्पष्ट जड़ के जीवित और पूरे 12 महीने हरा-भरा रहता है। भक्त इसे 'मन्नत का पेड़' मानते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए धागा बांधते हैं और मन्नत पूरी होने पर उसे खोलने वापस आते हैं।