नईदुनिया प्रतिनिधि, सीहोर। सीहोर का चिंतामन गणेश मंदिर देश के गणपति के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि देश में भगवान गणेश के चार ऐसे मंदिर है जहां भगवान गणेश मूर्ति रूप में स्वयं विराजे हैं। सीहोर का गणेश मंदिर इन्ही चारो मंदिरों में से एक है। मंदिर के स्थापत्य को लेकर दो मान्यताएं हैं। माना जाता है कि मंदिर की स्थापना दो हजार साल पहले राजा विक्रमादित्य ने की थी। यहां यह भी किवदंती प्रचलित है कि राजा विक्रमादित्य को गणपति की यह मूर्ति स्वयं भगवान गणेश जी ने ही दी थी।
एक यह भी मान्यता है कि भगवान गणेश विक्रमादित्य के पूजन से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और मूर्ति स्वरूप में स्वयं यहां स्थापित हो गए। दूसरी मान्यता है कि मंदिर पैशवाकालीन है। मंदिर की वास्तुकला पैशवाकालीन है तो कई लोगों का यह भी मानना है कि हो सकता है मंदिर विक्रमादित्य के काल का ही हो, लेकिन बाद में इसका जीर्णोद्धार पैशवाओं ने कराया हो। शहर में इस मंदिर के अलावा छह अन्य पैशवा कालीन मंदिर और भी हैं। जिसमें तीन शिव मंदिर, एक हनुमान गढ़ी, एक नरसिंह मंदिर और भगवान दत्तात्रेय का मंदिर शामिल है। वहीं सीहोर के अलावा चिंतामन गणेश की देशभर में जो तीन प्रतिमाएं हैं, जिन्हें स्वयंभू कहा जाता है उनमें से एक राजस्थान के रणथंभौर में है, दूसरी प्रतिमा उज्जैन में और तीसरी प्रतिमा गुजरात के सिद्धपुर के गणेश मंदिर में स्थापित है। सीहोर की स्वयंभू प्रतिमा जमीन के अन्दर आधी धंसी हुई है।
चिंतामन गणेश मंदिर भोपाल से 40 किमी दूर सीहोर जिले में सीवन नदी के किनारे गोपालपुर गांव में स्थित है। पैशवा वास्तुकला की बेजोड़ झलक चिंतामन गणेश मंदिर में दिखाई देती है। सीहोर का चिंतामन सिद्ध गणेश मंदिर 84 सिद्ध गणेश मंदिरों में से एक है। सीहोर का गणेश मंदिर पेशवाकालीन श्रीयंत्र के कोण पर बना हैं। जिसमें गर्भगृह में भगवान शिव बिराजे है। वहीं भव्य शिखर के साथ माता अंबिका तथा दूसरे शिखर पर मां दुर्गा मां और मां शारदा है। भगवान राधाकृष्ण जी के साथ ही वैदिक मंगल कलश, ऊपर पवित्र सुन्दर सभा मंडप है। नीचे सभा मंडप और परिक्रमा पथ है। मंदिर के बगल में ही विशाल वट वृक्ष है जिसमें अनेक देवी देवता विराजे है। इसके साथ ही परिसर में शीतला माता, भैरवनाथ तथा हनुमान जी का मंदिर है।
गणेश चतुर्थी के अवसर पर हजारों श्रद्धालु इस मंदिर में आकर विशेष पूजन करते हैं। यहां की दिव्यता, प्राचीनता और भक्तों की अनगिनत कहानियां इसे भारत के सबसे रहस्यमयी और पूजनीय गणेश मंदिरों में से एक बनाती हैं। वहीं गणेश चतुर्थी से अंनत चौदस तक यहां विशेषज्ञ मेले का आयोजन भी किया जाता है। इसके साथ ही क्षेत्र के लोग घर में शादि या कोई अन्य मंगल कार्य होने पर यहां प्रथम निमंत्रण देने आते हैं। यहां मंदिर पर उल्दा स्वास्तिक बनाने की परंपरा भी है। जो किसी मन्नत के लिए बनाया जाता है। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु स्वास्तिक सीधा करने भी आते हैं।
यहां हर साल आने वाले भक्त मंदिर का बोर्ड देखकर चकित रह जाते हैं कि उन्होंने चिंतामन सिद्ध भगवान गणेश के दर्शन किए या श्री सिद्धि विनायक भगवान गणेश के। हर साल गणेश चतुर्थी से पहले यहां भगवान का नाम बदल जाता है। हर साल नाम बदलने का कारण दो पुजारियों के बीच चल रहा विवाद है। दरअसल गणेश मंदिर पर शहर के कस्बा क्षेत्र निवासी व्यास परिवार और दुबे परिवार ने कोर्ट में दावा प्रस्तुत किया है। कई दशकों से दोनों परिवारों के बीच विवाद कोर्ट में चल रहा है। कोर्ट ने फैसला आने तक दोनों परिवार को एक-एक साल के मंदिर के पुजारी के रूप में व्यवस्था सौंपी है।
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गणेश चतुर्थी से पहले तक मंदिर की व्यवस्था दुबे परिवार के हाथ में थी और अब यहां की व्यवस्था व्यास परिवार संभाल रहा है। दुबे परिवार जब आता है तो वह मंदिर के मुख्य द्वार पर एक बोर्ड लगाता है जिस पर लिखा होता है चिंतामन सिद्ध गणेश मंदिर, वहीं जब व्यास परिवार के हाथ में व्यवस्था आती है तो वो बोर्ड पर लिखते हैं, स्वयंभू श्री सिद्धि विनायक श्री गणेश धाम। वर्तमान में मंदिर के मुख्य द्वार पर स्वयं भू श्री सिद्धि विनायक श्री गणेश धाम का बोर्ड लगा है।