
धर्म डेस्क। सांतऊ शीतला माता मंदिर के दर्शन के लिए चीनौर रोड पर सड़क किनारे लाइन में खड़े श्रद्धालुओं को देर रात करीब 1:30 बजे एक तेज रफ्तार बेकाबू ट्रक ने कुचल दिया। इस भीषण हादसे में 15 लोगों की मौत हो गई, जबकि दो पुलिसकर्मियों समेत 26 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं।
ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर यह मंदिर कितना प्रसिद्ध और पुराना है जिसमें दर्शन के लिए रात के 1:30 बजे भी लोग भीड़ लगाए खड़े थे।
ग्वालियर जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित सांतऊ का अति-प्राचीन शीतला माता मंदिर न केवल आम श्रद्धालुओं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से ग्वालियर-चंबल अंचल के कुख्यात डकैतों और पुलिस दोनों की अगाध आस्था का मुख्य केंद्र रहा है।
कई साल पुराने इस सिद्ध पीठ को चंबल के बीहड़ों में कभी 'डकैतों की आराध्य देवी' के रूप में भी जाना जाता था।
80 और 90 के दशक में ग्वालियर-चंबल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान तक खौफ का पर्याय रहे दुर्दांत डाकू- मोहर सिंह, मलखान सिंह, डाकू माधौसिंह और दयाराम-रामबाबू गड़रिया गैंग इस मंदिर में नियमित रूप से शीश नवाते थे।
मंदिर के चारों ओर घना जंगल होने के कारण डकैत यहां छिपते थे और पुलिस को चुनौती देकर मां के चरणों में मत्था टेकते थे। अपनी सुरक्षा और मुराद पूरी होने पर डकैत यहां भारी-भरकम पीतल के घंटे भेंट करते थे।
एंटी-डकैत मूवमेंट में शामिल रहे रिटायर्ड पुलिस अफसर अशोक भदौरिया के अनुसार, दयाराम-रामबाबू गड़रिया गैंग का आतंक खत्म करने के लिए पुलिस टीम को स्वयं मां शीतला के दरबार में विशेष प्रार्थना करनी पड़ी थी।
पुलिस अधिकारियों ने मन्नत मांगी थी कि यदि गड़रिया गैंग का खात्मा होता है, तो पुलिस डकैतों द्वारा चढ़ाए गए घंटे से भी अधिक वजनी घंटा मां के चरणों में अर्पित करेगी। मां की कृपा से जब पुलिस ने गड़रिया गैंग को एनकाउंटर में ढेर कर दिया, तो अफसर अशोक भदौरिया और उनकी टीम ने मंदिर पहुंचकर वजनी घंटा चढ़ाकर अपनी मन्नत पूरी की।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सांतऊ गांव के रहने वाले प्रथम भक्त गजाधर भिंड जिले के गोहद (खरौआ) स्थित देवी मंदिर में नियमित रूप से गाय के दूध से अभिषेक करते थे।
गजाधर की भक्ति से प्रसन्न होकर देवी मां कन्या रूप में प्रकट हुईं और सांतऊ गांव के बाहर घने जंगलों में पहाड़ी पर विराजमान हो गईं। वर्तमान में महंत गजाधर के वंशज (5वीं पीढ़ी के महंत नाथूराम) मंदिर की पूजा-पाठ की परंपरा संभाल रहे हैं।
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