
धर्म डेस्क: हेमकुंड साहिब की यात्रा को भारत की सबसे चुनौतीपूर्ण तीर्थ यात्राओं (Gurudwara Hemkund Sahib History) में से एक माना जाता है। यह पवित्र गुरुद्वारा समुद्र तल से 15 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लंबी और कठिन पैदल यात्रा करनी पड़ती है। इसके बावजूद भक्त पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ इस यात्रा को पूर्ण करते हैं।

दसम ग्रंथ में वर्णन मिलता है कि सिखों के दसवें और अंतिम गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने पूर्व जन्म में इसी स्थान पर कठोर तपस्या की थी। इसी कारण हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा सिख धर्म में अत्यंत पूजनीय माना जाता है और श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।
हेमकुंड साहिब का महत्व केवल सिख धर्म तक सीमित नहीं है। हिंदू धर्म में भी इस स्थान को अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि रामायण काल में लक्ष्मण जी ने इसी स्थान पर ध्यान किया था। यहां लक्ष्मण जी द्वारा स्थापित एक मंदिर भी स्थित है, जो इस धार्मिक विश्वास को और अधिक सुदृढ़ करता है।
दो से अधिक सदियों तक हेमकुंड साहिब गुमनामी में रहा। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी आत्मकथा ‘बिचित्र नाटक’ में इस स्थान का उल्लेख किया, जिसके बाद इसकी पहचान सामने आई। पंडित तारा सिंह नरोत्तम को हेमकुंड की भौगोलिक स्थिति का पता लगाने वाला पहला सिख माना जाता है। उन्होंने ‘श्री गुड़ तीरथ संग्रह’ में हेमकुंड साहिब को 508 सिख धार्मिक स्थलों में शामिल किया।
नाम, भौगोलिक बनावट और विशेषताएं
हेमकुंड एक संस्कृत शब्द है, जिसमें ‘हेम’ का अर्थ बर्फ और ‘कुंड’ का अर्थ कटोरा होता है। बर्फ से घिरी कटोरे जैसी झील के कारण इस स्थान का नाम हेमकुंड पड़ा। पहाड़ों से घिरे इस क्षेत्र में एक बड़ा तालाब भी है, जिसे लोकपाल अर्थात ‘लोगों का पालनहार’ कहा जाता है।
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