
धर्म डेस्क। हिंदू धर्म के भीतर अघोर पंथ को सबसे कठिन और रहस्यमयी आध्यात्मिक मार्गों में से एक माना जाता है। भगवान शिव के 'भैरव' रूप के उपासक, अघोरी अपनी विशिष्ट जीवनशैली और कठिन साधना के लिए जाने जाते हैं।
'अघोर' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'जो घोर न हो' अर्थात जो अत्यंत सरल और सहज हो। हालांकि, इस सहजता को प्राप्त करने का मार्ग साधारण मनुष्य के लिए लगभग असंभव माना जाता है।
अघोर पंथ में दीक्षित होना किसी कठोर तपस्या से कम नहीं है। इसके लिए कुछ बुनियादी लेकिन अनिवार्य शर्तें हैं-
12 वर्षों की तपस्या - एक पूर्ण अघोरी बनने के लिए गुरु के सानिध्य में कम से कम 12 वर्ष तक कठिन साधना करनी होती है।
सांसारिक मृत्यु - अघोरी बनने से पूर्व व्यक्ति को स्वयं का 'पिंडदान' करना पड़ता है। इसका अर्थ यह है कि वह सांसारिक रूप से अपने परिवार और समाज के लिए मृत हो चुका है और उसका नया जन्म केवल शिव भक्ति के लिए हुआ है।
गुरु का मार्गदर्शन - अघोर विद्या अत्यंत गुप्त और जटिल है, जिसे बिना गुरु के सीखना असंभव माना जाता है। गुरु ही शिष्य की मानसिक और शारीरिक क्षमता को परखकर उसे दीक्षित करते हैं।
अघोरियों के जीवन दर्शन के पीछे मुख्य उद्देश्य मोह-माया और भेदभाव को समाप्त करना है। इसके लिए वे इन 5 नियमों का पालन करते हैं-
श्मशान निवास - अघोरी श्मशान घाट को ही अपना स्थाई निवास मानते हैं। उनके अनुसार, श्मशान ही वह स्थान है जहाँ जीवन का अंतिम सत्य (मृत्यु) स्पष्ट रूप से दिखाई देता है और जहाँ भगवान शिव का वास होता है।
चिता भस्म का लेप - अघोरी अपने शरीर पर चिता की राख (भस्म) मलते हैं। यह निरंतर याद दिलाता है कि मानव शरीर नश्वर है और अंततः मिट्टी में ही मिल जाना है।
कपाल साधना (नरमुंड) - अघोरी हमेशा अपने पास मानव खोपड़ी रखते हैं, जिसे 'कपाल' कहा जाता है। वे इसी में भोजन और जल ग्रहण करते हैं। यह परंपरा प्राचीन कपालिक संप्रदाय से जुड़ी है।
अभक्ष्य भक्षण और अद्वैत भाव - अघोरी खान-पान में पवित्रता या अपवित्रता का भेद नहीं करते। समाज जिसे 'अशुद्ध' मानकर त्याग देता है, अघोरी उसे भी ईश्वर का रूप मानकर स्वीकार करते हैं। यह पूर्ण 'अद्वैत' (बिना किसी भेदभाव के) की स्थिति प्राप्त करने का प्रयास है।
गुप्त शव साधना - अघोरी आधी रात के समय श्मशान में शवों के ऊपर बैठकर साधना करते हैं। यह साधना बेहद गुप्त होती है और माना जाता है कि इससे उन्हें अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं।
विशेष नोट - अघोरियों का मूल दर्शन है 'हर वस्तु में ईश्वर को देखना।' उनके लिए न कुछ गंदा है और न ही कुछ घृणा के योग्य। वे समाज से दूर रहकर अपनी एकांत साधना में लीन रहते हैं।