
धर्म डेस्क। महाभारत की विशाल गाथा में पांडवों के वनवास काल के कई प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें से एक है महाबली भीम और राक्षस कन्या हिडिंबा का विवाह। यह केवल एक प्रेम कथा नहीं थी, बल्कि माता कुंती की एक ऐसी शर्त पर आधारित विवाह था, जिसने भविष्य में महाभारत के युद्ध की दिशा बदल दी।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, लाक्षागृह की साजिश से सुरक्षित निकलने के बाद पांडव माता कुंती के साथ वन में विश्राम कर रहे थे। एक रात जब भीम पहरेदारी कर रहे थे, तब उस क्षेत्र के राक्षस राजा हिडिंब ने अपनी बहन हिडिंबा को मानव मांस लाने के लिए भेजा।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था; भीम के विशाल व्यक्तित्व और बल को देखकर हिडिंबा उन पर मोहित हो गई और उसने एक सुंदर स्त्री का रूप धरकर भीम के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा।
जब हिडिंबा काफी देर तक वापस नहीं लौटी, तो उसका भाई हिडिंब वहां पहुंचा। अपनी बहन को मानव प्रेम में आसक्त देख वह क्रोधित हो गया और भीम पर हमला कर दिया। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें भीम ने हिडिंब का वध कर दिया। अपने भाई की मृत्यु के बाद हिडिंबा ने पुनः माता कुंती से भीम के साथ विवाह की गुहार लगाई।
भीम आरंभ में इस विवाह के पक्ष में नहीं थे, लेकिन माता कुंती ने राजनीति और धर्म को देखते हुए इसकी अनुमति दे दी। हालांकि, उन्होंने हिडिंबा के सामने एक कड़ी शर्त रखी। भीम और हिडिंबा केवल तब तक साथ रहेंगे, जब तक उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हो जाती। पुत्र जन्म के पश्चात भीम को वापस अपने भाइयों के पास लौटना होगा। हिडिंबा ने प्रेम की खातिर इस शर्त को स्वीकार कर लिया और दोनों का विवाह संपन्न हुआ।
इसी विवाह के फलस्वरूप मायावी और अत्यंत बलशाली पुत्र घटोत्कच का जन्म हुआ। घटोत्कच ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों की ओर से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की और अपनी शक्ति से कौरव सेना में हाहाकार मचा दिया था। रोचक तथ्य यह भी है कि घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक था, जिन्हें आज कलयुग के देव 'खाटू श्याम' के रूप में पूजा जाता है।
भले ही हिडिंबा राक्षस कुल की थीं, लेकिन उनके त्याग और भक्ति के कारण उन्हें देवी के रूप में पूजा जाता है। हिमाचल प्रदेश के मनाली में स्थित 'हिडिंबा देवी मंदिर' आज भी उनकी आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां देश-दुनिया से श्रद्धालु शीश नवाने आते हैं।