
धर्म डेस्क। काली पूजा के पंडालों में मां काली की विशाल प्रतिमा के साथ कुछ ऐसी आकृतियां भी दिखाई देती हैं, जिन्हें देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। लंबे दांत, खुले बाल, बड़ी-बड़ी आंखें और डरावना चेहरा… इन आकृतियों को देखकर पहली नजर में लगता है कि ये कोई राक्षसियां हैं। झारखंड के कई इलाकों में इन्हें आकनी और डाकनी कहा जाता है। वहीं, बंगाल में इनसे मिलती-जुलती आकृतियों को डाकिनी और योगिनी के नाम से पहचाना जाता है।
लेकिन सवाल यह है कि मां काली के साथ इनकी मूर्तियां क्यों बनाई जाती हैं? क्या ये सच में बुरी शक्तियों का प्रतीक हैं या फिर इनके पीछे कोई धार्मिक मान्यता जुड़ी है? दरअसल, शाक्त और तांत्रिक परंपराओं में इन आकृतियों का खास महत्व माना गया है।
झारखंड के कई इलाकों में काली पूजा के दौरान मां काली के आसपास दिखाई देने वाली डरावनी स्त्री आकृतियों को आकनी-डाकनी कहा जाता है। इनका रूप आम देवी-देवताओं की मूर्तियों से काफी अलग होता है। इनके खुले बाल, बड़े दांत और डरावना चेहरा इन्हें अलग पहचान देते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बंगाल की परंपरा में डाकिनी और योगिनी को मां काली की सहचरियां यानी उनके साथ रहने वाली शक्तियां माना जाता है। इन्हें केवल राक्षसी या बुरी आत्माएं समझना सही नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में इनके नाम, रूप और पूजा से जुड़ी मान्यताएं भी अलग-अलग हो सकती हैं।
हिंदू धर्म की शाक्त परंपरा में देवी को सर्वोच्च शक्ति माना जाता है। इस परंपरा में मुख्य देवी के साथ उनकी सहायक शक्तियों और गणों की पूजा करने की भी मान्यता है। इसी वजह से कुछ काली मंदिरों और पूजा पंडालों में मां काली के साथ डाकिनी और योगिनी की मूर्तियां भी स्थापित की जाती हैं।
इनका संबंध तांत्रिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यता में इन्हें देवी की शक्तियों और उनके आसपास रहने वाली दिव्य शक्तियों के रूप में देखा जाता है। इनका डरावना रूप भी एक खास प्रतीक माना जाता है। यह रूप बताता है कि शक्ति हमेशा सुंदर या शांत दिखाई दे, ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार उग्र रूप भी शक्ति, साहस और बुरी शक्तियों पर नियंत्रण का प्रतीक होता है।
भारतीय धार्मिक परंपरा में 64 योगिनियों की पूजा का भी विशेष महत्व रहा है। देश के कई हिस्सों में 64 योगिनियों को समर्पित प्राचीन मंदिर मिलते हैं। हालांकि, डाकिनी और योगिनी की मान्यताएं अलग-अलग परंपराओं में अलग हो सकती हैं। इसलिए हर जगह इन्हें एक ही रूप में देखना सही नहीं होगा।
मां काली के साथ जुड़ी इन शक्तियों की पूजा से संबंधित कुछ परंपराएं काफी अलग भी हैं। उदाहरण के तौर पर, कोलकाता के कालीघाट मंदिर की पूजा परंपरा में मां काली को शाकाहारी भोग चढ़ाया जाता है, जबकि डाकिनी और योगिनी को मांस का भोग लगाने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि, यह व्यवस्था हर काली मंदिर या हर पूजा पंडाल में नहीं होती।
यही वजह है कि काली पूजा में मां की प्रतिमा के साथ दिखाई देने वाली आकनी-डाकनी लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी रहती हैं। झारखंड और बंगाल की स्थानीय परंपराओं में इनके अलग-अलग नाम और रूप देखने को मिलते हैं। इनके पीछे देवी की सहचर शक्तियों, तांत्रिक साधना और लोकमान्यताओं का मेल दिखाई देता है।
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