
धर्म डेस्क। महाकवि कालिदास की आराध्य देवी मां गढ़कालिका उज्जैन में उत्तर दिशा की ओर है। बताया जाता है कि वर्षों पूर्व उज्जैन नगरी वर्तमान नगर से उत्तर की ओर बसी हुई थी। तब इस क्षेत्र को गढ़ कहा जाता था। यहां कई ऊंचे-नीचे छोटे-छोटे पहाड़ और खाइयां हुआ करती थी। वर्तमान में धीरे-धीरे गढ़कालिका के पहुंच मार्ग पर बस्तियां बस गई। इस मंदिर में भी दो छोटे-छोटे दीप स्तंभ बने हुए हैं।
किंवदंती है कि महाकवि कालिदास को मां गढ़कालिका के आशीर्वाद से ही ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। मंदिर के गर्भगृह में मां गढ़कालिका का मुख भव्य स्वरूप में है, जिसमें दो विशाल नेत्र और जिव्हा बाहर निकली हुई है। मूर्ति सिंदूर से आच्छादित रहती है। मूर्ति के दोनों ओर महासरस्वती तथा महालक्ष्मी की मूर्तियां हैं।
मंदिर परिसर में मूर्ति के सामने एक ओटले पर सिंह की मूर्ति है, जो माता का वाहन है। शासन ने वर्षों पूर्व मंदिर का अधिग्रहण कर लिया था। मंदिर में नित्य आरती प्रात: 10 बजे और संध्या आरती सूर्यास्त के दौरान होती है। नवरात्र के दौरान महाअष्टमी पर रात 12 बजे हवन और विशिष्ट महाआरती की जाती है।

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इस दौरान बड़ी संख्या में लोग आरती में शामिल होते हैं। किसी समय यह शहर का एकांत स्थल माना जाता था। आज इसके पहुंच मार्ग पर बस्तियां है। मंदिर के पास ही मत्स्येंद्रनाथ की समाधि है। मंदिर के पास ही विक्रांत भैरव और काल भैरव जाने के लिए मार्ग है।
महाकवि कालिदास से संबद्ध एक कथा है कि महाकवि कालिदास ने माता गढ़कालिका की पूजा पाठ और साधना कर महाज्ञान को प्राप्त किया। बताया जाता है कि महाकवि कालिदास पहले एक महामूर्ख व्यक्ति थे। जिस डाल को काटना होता है, उसी पर बैठकर डाल काटा करते थे। तंत्र साधना, शक्ति के लिए भी माता गढ़कालिका की आराधना की जाती है।