
धर्म डेस्क। सनातन धर्म की बहुविध और समृद्ध संस्कृति में आदिशक्ति मां दुर्गा की आराधना का विधान अनूठा है। आश्विन माह की शारदीय नवरात्रि के दौरान जहां पूरे देश में मां दुर्गा की 'शक्ति' और 'महिषासुरमर्दिनी' रूप में पूजा होती है, वहीं बंगाली संस्कृति में यह महापर्व सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान न होकर, एक विवाहित बेटी के अपने मायके (माता-पिता के घर) लौटने के सबसे बड़े स्नेहपूर्ण उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
हमारी संस्कृति की यह अद्भुत विशेषता है कि एक ही देवी में वात्सल्य, पारिवारिक स्नेह और परम शक्ति दोनों के दर्शन होते हैं। आइए जानते हैं इन दोनों दृष्टिकोणों के पीछे की मुख्य सांस्कृतिक और पौराणिक मान्यताएं-
बंगाली समाज में देवी दुर्गा को केवल सर्वशक्तिमान देवी नहीं, बल्कि अपने घर की लाडली बेटी माना जाता है- लोक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा (जिन्हें प्यार से 'उमा' या 'गौरी' कहा जाता है) पर्वतराज हिमालय और रानी मेनका की पुत्री हैं। विवाह के पश्चात वे भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर रहती हैं।
ऐसी मान्यता है कि साल में एक बार (दुर्गा पूजा के दौरान) उमा अपने पति का घर छोड़कर अपने चारों बच्चों- गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ चार दिनों के लिए अपने मायके आती हैं। बंगाली समाज उनका स्वागत ठीक उसी तरह करता है जैसे माता-पिता अपनी शादीशुदा बेटी के घर आने पर उसका लाड़-प्यार और आवभगत करते हैं।
विजयादशमी (दशमी) के दिन मूर्ति विसर्जन को देवी की ससुराल (कैलाश) वापसी यानी 'विदाई' के रूप में देखा जाता है। इस अवसर पर माहौल अत्यंत भावुक हो जाता है। सुहागिन महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर 'सिंदूर खेला' की परंपरा निभाती हैं। अश्रुपूरित नेत्रों से उमा को विदा कर अगले साल फिर आने का निमंत्रण देती हैं।
उत्तर भारत और देश के अन्य राज्यों में नवरात्रि के दौरान देवी के प्रति परम श्रद्धा, समर्पण और रक्षक का भाव प्रमुख होता है-
जहां बंगाल में देवी दुर्गा के साथ एक गहरा, आत्मीय और पारिवारिक (बेटी का) सम्बंध झलकता है, वहीं शेष भारत में उनके प्रति पूर्ण समर्पण, भय-मुक्ति और भक्ति का भाव दिखता है। यह अंतर भारतीय संस्कृति की उस सुंदरता को दर्शाता है, जहां एक ही महादेवी में वात्सल्य, ममता और ब्रह्मांडीय शक्ति का असीम संगम देखने को मिलता है।
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