
धर्म डेस्क। भारतीय धर्मग्रंथों में 'महाभारत' और 'श्रीमद्भगवद्गीता' दोनों का विशेष महत्व है, लेकिन घर में इन्हें रखने को लेकर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण काफी अलग हैं। आम तौर पर माना जाता है कि घर में संपूर्ण महाभारत के बजाय केवल गीता रखनी चाहिए। महाभारत एक विशाल महाकाव्य है जो मानव स्वभाव के हर रंग- प्रेम, ईर्ष्या, छल और प्रतिशोध को दर्शाता है।
हालांकि यह 'धर्म' की जीत की गाथा है, लेकिन इसका मुख्य सार पारिवारिक संघर्ष, गृह-युद्ध और अपनों के ही विनाश पर आधारित है। लोक मान्यताओं के अनुसार, जिस स्थान पर महाभारत का पूरा ग्रंथ रखा जाता है या उसका नियमित पाठ होता है, वहां कलह और विवाद की परिस्थितियां बनने की संभावना रहती है। गृहस्थ जीवन में जहां शांति और सौहार्द की कामना की जाती है, वहां इस ग्रंथ की एनर्जी नेगेटिव प्रभाव डाल सकती है।
इसके उलट, श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का ही एक अंश होते हुए भी पूर्णतः अलग ऊर्जा प्रदान करती है। यह युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया वह उपदेश है, जो मोह और दुविधा को नष्ट करता है। गीता हमें कर्म, धैर्य और विवेक सिखाती है। गीता जीवन के संघर्षों का समाधान देती है, न कि संघर्ष को बढ़ाती है। इसे घर में रखने से ज्ञान, मानसिक शांति और सकारात्मकता का संचार होता है। यह सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित हुए बिना अपने धर्म (कर्तव्य) का पालन कैसे करें।
निष्कर्ष- महाभारत हमें युद्ध के विनाशकारी परिणामों से परिचित कराती है, जबकि गीता हमें उस युद्ध के बीच शांत रहकर सही निर्णय लेने का ज्ञान देती है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में विनाश की गाथा (महाभारत) के बजाय जीवन के सार (गीता) को घर के मंदिर में स्थान देना अधिक शुभ और प्रेरणादायक माना गया है।
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