धर्म डेस्क। हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कारों का वर्णन है, जिनमें अंतिम संस्कार सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। आपने अक्सर देखा होगा कि शव यात्रा के दौरान लोग 'राम नाम सत्य है' का जाप करते हैं। लेकिन क्या यह केवल एक परंपरा है या इसके पीछे कोई गहरा विज्ञान और दर्शन छिपा है।
धार्मिक विद्वानों और शास्त्रों के अनुसार, इस छोटे से वाक्य में जीवन का सबसे बड़ा सत्य समाहित है। आइए जानते हैं इसके पीछे के मुख्य कारण-
1. जीवन की नश्वरता का बोध
'राम नाम सत्य है' का अर्थ है कि इस संसार में केवल परमात्मा (राम) का नाम ही शाश्वत है, बाकी सब नश्वर है।
महाभारत का प्रसंग - यक्ष-युधिष्ठिर संवाद के एक श्लोक (अहन्यहनि भूतानि...) के अनुसार, मनुष्य हर दिन दूसरों को मरते हुए देखता है, फिर भी वह मोह-माया और धन-संपत्ति को स्थायी मानकर जीने की भूल करता है।
शव यात्रा में शामिल लोगों के लिए यह वाक्य एक 'वेक-अप कॉल' की तरह काम करता है, जो उन्हें याद दिलाता है कि अंत में सब कुछ यहीं छूट जाएगा।
2. प्रेत-बाधाओं से सुरक्षा (रुद्रयामल तन्त्र का मत)
शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के बाद जब तक शरीर का दाह संस्कार नहीं हो जाता, तब तक आत्मा के आसपास की ऊर्जा संवेदनशील होती है।
'शिवे शिवे न संचारों...' श्लोक के अनुसार, अग्नि देने तक निरंतर 'राम' नाम का जप करने से नकारात्मक शक्तियों या प्रेत-बाधाओं का प्रवेश शव में नहीं हो पाता। यह मंत्र एक सुरक्षा कवच का निर्माण करता है और आत्मा को शांति प्रदान करता है।
3. मोक्ष और शांति की कामना
आनंद रामायण में 'राम' नाम की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।
शक्तिशाली मंत्र - शास्त्रों का मानना है कि 'राम' शब्द का उच्चारण मात्र करने से व्यक्ति के पापों का क्षय होता है। शव यात्रा के दौरान सामूहिक जाप से वातावरण में एक सात्विक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो मृतक की आत्मा को सद्गति (मोक्ष) की ओर अग्रसर करने में सहायक मानी जाती है।
'राम नाम सत्य है' कहना केवल शोक प्रकट करना नहीं है, बल्कि यह जीवित लोगों को वैराग्य और धर्म की ओर प्रेरित करने का एक माध्यम है। यह इस बात का प्रमाण है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि परमात्मा में विलीन होने की एक प्रक्रिया है।