
धर्म डेस्क। राजस्थान के दौसा जिले में स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर अपनी अनोखी धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। आमतौर पर लोग मंदिर से भगवान का प्रसाद लेकर घर लौटते हैं, लेकिन मेहंदीपुर बालाजी मंदिर को लेकर एक अलग मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि यहां चढ़ाया गया कुछ विशेष प्रसाद और पूजा सामग्री घर नहीं ले जानी चाहिए। आखिर इसके पीछे क्या वजह है?
मेहंदीपुर बालाजी मंदिर में हनुमान जी के बाल स्वरूप की पूजा होती है। यहां बड़ी संख्या में ऐसे श्रद्धालु पहुंचते हैं, जो मानसिक परेशानियों या कथित प्रेतबाधा से मुक्ति की कामना करते हैं। मंदिर में बालाजी महाराज के साथ प्रेतराज सरकार और भैरव बाबा की भी पूजा की जाती है।
स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां कुछ विशेष अनुष्ठानों में चढ़ाई गई सामग्री को मंदिर परिसर में ही छोड़ दिया जाता है। मान्यता है कि पूजा के दौरान नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति की कामना की जाती है, इसलिए उस अनुष्ठान से जुड़ी सामग्री को वापस घर नहीं ले जाना चाहिए। कुछ श्रद्धालु इसे इस विश्वास से भी जोड़ते हैं कि ऐसा करने पर नकारात्मक शक्तियां उनके साथ घर लौट सकती हैं।
इस परंपरा को लेकर एक जरूरी अंतर समझना भी जरूरी है। मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, सवामणी का प्रसाद परिवार के साथ ग्रहण किया जा सकता है और घर भी ले जाया जा सकता है। वेबसाइट पर परिवार के उन सदस्यों के लिए भी प्रसाद ले जाने की अनुमति बताई गई है, जो मंदिर नहीं आ पाए।
इसलिए मंदिर से जुड़े हर प्रसाद पर रोक होने की बात सही नहीं है। दरअसल, विशेष अनुष्ठानों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और सामान्य भोग के प्रसाद के बीच अंतर है।
मेहंदीपुर बालाजी में दरखास्त और अर्जी जैसे विशेष अनुष्ठान भी किए जाते हैं। राजस्थान सरकार की मंदिर परिसर से जुड़ी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अर्जी के दौरान लड्डू, उड़द की दाल और चावल चढ़ाए जाते हैं। इन अनुष्ठानों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का अपना धार्मिक महत्व है।
इस मंदिर की यह परंपरा दिखाती है कि हर धार्मिक स्थान पर प्रसाद से जुड़े नियम एक जैसे नहीं होते। मेहंदीपुर बालाजी में कुछ विशेष चढ़ावों को वहीं छोड़ने की मान्यता है, जबकि सामान्य सवामणी प्रसाद घर ले जाने की सुविधा भी उपलब्ध है।
यह भी पढ़ें- छठ पूजा 2026: 13 से 16 नवंबर तक चलेगा महापर्व, जानें नहाय-खाय, खरना और दोनों अर्घ्य का शुभ मुहूर्त