
धर्म डेस्क। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत और हनुमान जी के शौर्य और चरित्र से हर कोई परिचित है। परंतु इस महाकाव्य में कुछ ऐसे दिव्य और अल्पचर्चित पात्र भी हैं, जिनके निर्णायक योगदान के बिना माता सीता की खोज की दिशा तय होना असंभव था। इन्हीं में से एक अत्यंत रहस्यमयी, तपोनिष्ठ और सिद्ध चरित्र हैं- तपस्विनी स्वयंप्रभा।
रामायण के 'किष्किंधा कांड' में वर्णित यह प्रसंग दर्शाता है कि किस प्रकार एक तपस्विनी की योग शक्ति ने पूरी वानर सेना को जीवनदान दिया और उन्हें सीधे लक्ष्य के द्वार तक पहुंचा दिया।
रामायण के अनुसार, जब लंकापति रावण माता सीता का हरण कर ले गया, तब किष्किंधा नरेश सुग्रीव ने चारों दिशाओं में वानरों के दल भेजे। दक्षिण दिशा के सबसे महत्वपूर्ण दल का नेतृत्व युवराज अंगद कर रहे थे, जिसमें हनुमान जी, जाम्बवंत, नल और नील जैसे महारथी शामिल थे।
विंध्याचल के बीहड़ जंगलों में कई दिनों तक भटकने के बाद वानर दल भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल हो गया। जल की तलाश करते हुए उन्हें एक विशाल, घोर अंधकारमय गुफा दिखाई दी, जिसे 'ऋक्षबिल' कहा जाता था। गुफा के मुख से जलपक्षी निकलते देख वानरों को भीतर पानी होने की उम्मीद जगी और वे गुफा में प्रवेश कर गए।
घने अंधेरे को पार करते ही वानर सेना एक अलौकिक दृश्य देखकर स्तब्ध रह गई। बाहर से भयानक दिखने वाली गुफा के भीतर एक स्वर्णिम संसार बसा था। यह दिव्य नगर शिल्पी मय दानव द्वारा निर्मित था, जहां स्वर्ण और रजत के महल, मणियों से लदे वृक्ष और अमृत तुल्य मीठे जल के सरोवर थे।
इसी रमणीक स्थल पर चीर वस्त्र धारण किए, मुख पर ब्रह्मतेज लिए एक तपस्विनी समाधिस्थ थीं। वे महातपस्वी मेरुसावर्णि की पुत्री स्वयंप्रभा थीं, जो अपनी सखी हेमा (अप्सरा) के उपवन की रक्षा करते हुए तपस्या में लीन थीं।
वानरों की स्थिति देखकर स्वयंप्रभा ने उनके आगमन का प्रयोजन पूछा। पवनपुत्र हनुमान जी ने विनम्रतापूर्वक परिचय देते हुए बताया कि वे अयोध्यापति भगवान श्री राम के दूत हैं और रावण द्वारा हरी गईं माता जानकी की खोज में भटककर यहां पहुंचे हैं।
प्रभु श्री राम का नाम सुनते ही स्वयंप्रभा का हृदय भक्तिभाव से भर गया। उन्होंने अत्यंत आदर और प्रेम से पूरी वानर सेना को दिव्य फल और शीतल जल ग्रहण कराकर उनकी भूख और प्यास शांत की।
जब वानरों ने बाहर निकलने का मार्ग पूछा, तो स्वयंप्रभा ने सचेत किया कि यह मय दानव की ऐसी मायावी गुफा है, जहां से कोई भी प्राणी जीवित बाहर नहीं जा सकता। वानर सेना यह जानकर अत्यंत निराश हो गई कि सुग्रीव द्वारा दी गई समय-सीमा भी समाप्त हो रही है।
तब तपस्विनी ने कहा कि वे भगवान श्री राम के कार्य में संलग्न हैं, इसलिए वे अपनी तपोशक्ति से उनकी सहायता करेंगी-
यदि स्वयंप्रभा उस दिन वानरों का मार्गदर्शन और उद्धार न करतीं, तो पूरी वानर सेना उस मायावी ऋक्षबिल में ही फंसी रह जाती।
गुफा से सुरक्षित बाहर निकलने के बाद ही वानर दल की भेंट गिद्धराज जटायु के ज्येष्ठ भ्राता संपाती से हुई। संपाती ने ही अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर पहली बार प्रमाणित रूप से बताया कि माता सीता 100 योजन दूर समुद्र पार लंका के अशोक वाटिका में सुरक्षित हैं। इसके बाद ही पवनपुत्र हनुमान जी के समुद्र लांघने और लंका दहन की पृष्ठभूमि तैयार हुई।