
धर्म डेस्क। महाभारत का युद्ध केवल दो परिवारों की सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच लड़ा गया इतिहास का सबसे बड़ा वैचारिक युद्ध था। इस महायुद्ध में जहां 100 कौरव भाई अपने अहंकार और दुर्योधन के अधर्म के साथ खड़े रहे, वहीं धृतराष्ट्र का एक ऐसा पुत्र भी था जिसने सगे भाइयों का मोह त्यागकर धर्म की रक्षा के लिए पांडवों का दामन थाम लिया। उस योद्धा का नाम था- युयुत्सु।
युयुत्सु, धृतराष्ट्र का पुत्र था, जिसका जन्म गांधारी की दासी सुगधा के गर्भ से हुआ था। राजमहल में पलने के बावजूद युयुत्सु में दुर्योधन या दुशासन जैसी कुटिलता नहीं थी। वह बाल्यकाल से ही सत्य, धर्म और न्याय का प्रबल समर्थक था।
जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था और भीष्म पितामह, गुरु द्रोण तथा स्वयं महाराज धृतराष्ट्र सिर झुकाए मौन बैठे थे, उस समय कौरव कुल में केवल दो राजकुमारों ने इस घृणित कृत्य का कड़ा विरोध किया था- एक विकर्ण और दूसरा युयुत्सु। युयुत्सु ने दुर्योधन को चेताया था कि नारी के अपमान का परिणाम पूरे कुरुवंश के विनाश के रूप में सामने आएगा।
कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। शंखनाद से ठीक पहले धर्मराज युधिष्ठिर ने रथ से उतरकर दोनों सेनाओं के मध्य घोषणा की-
"जो भी योद्धा इस धर्मयुद्ध में अधर्म को छोड़कर सत्य और धर्म का साथ देना चाहता है, वह अभी हमारी सेना में आ सकता है, उसका सहर्ष स्वागत है।"
यह सुनते ही युयुत्सु ने बिना एक पल गंवाए अपना रथ कौरव सेना से बाहर निकाला और पांडवों के खेमे में जाकर खड़े हो गए। युयुत्सु भली-भांति जानते थे कि जिस पक्ष में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं, विजय वहीं होगी और भाइयों का अंधा मोह धर्म से बड़ा नहीं हो सकता।
18 दिनों तक चले भीषण संग्राम में धृतराष्ट्र के सौ पुत्र मारे गए, लेकिन धर्म के मार्ग पर चलने के कारण केवल युयुत्सु ही जीवित बचे।
युद्ध विजय के बाद महाराज युधिष्ठिर ने युयुत्सु को हस्तिनापुर के प्रशासन और गुप्तचर व्यवस्था की कमान सौंपी। जब पांडव स्वर्गारोहण के लिए निकले, तब उन्होंने अर्जुन के पौत्र और भावी चक्रवर्ती सम्राट राजा परीक्षित का संरक्षक तथा मार्गदर्शक किसी और को नहीं, बल्कि निष्ठावान युयुत्सु को ही नियुक्त किया था।
युयुत्सु का यह चरित्र सिद्ध करता है कि व्यक्ति कुल या जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्म और धर्म के चयन से महान बनता है।
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